तेरे बारे में जब सोचा नहीं था.
ये कहानी एक ऐसे लड़के की है, जो बहुत ही भोला है! अकेले रहना उसे अच्छा लगता है! या यूँ कहिये की वो बचपन से अकेला ही है। एकांतप्रिय।
वो भाई की शादी में गांव जाता है। वहां उसकी मुलाकात होती है एक लड़की परी से। वो इसे भा जाती है पर वो इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पाता। जानिये क्या होता है उस रात में ...
आज वह बहुत खुश है, क्योंकि वो अपने गांव जा रहा है। पापा उसे गांव नही जाने देते। बचपन से ही शहर में रहा है। मुश्किल से ६ या ७ बार गांव गया होगा। उसे अपना गांव बहुत पसंद है। लोगो का व्यवहार, उनका अपनापन बिलकुल असली सा ,कतई भी मिलावटी नहीं। जो मधुरता गांव की हवा में घुली है वो शहर में कहाँ। उसकी नजर में, गांव के लोग, यानि दहेड़ी में जमाई गई सजाई दही, और शहर के लोग, खट्टे छांछ (मठ्ठा) की तरह ( जिसे हम कभी कभी डॉक्टर के कहने पर स्वास्थ्य के नाम पर भुने हुए जीरे के साथ पी लेते हैं ).
इस बार वो अपने चचेरे भाई की शादी में गांव आया है। सब लोग जुटे हुए हैं शादी की तैयारी में। प्रणाम-अभिनन्दन कर वो भी एक कोना पकड़ के सब तैयारियों को देख रहा है। यहाँ उसका कोई मित्र नहीं,और सब लोग भी उसके एकांतप्रियता को जानते हैं। अभी शादी में दो दिन बाकि हैं ! तिलक हो चूका, तिलक में वो आ नहीं पाया था। उसका एग्जाम जो था बनारस में।
ये फ़रवरी का महीना है अभी हलकी-हलकी ठण्ड पड़ रही है।
वो अकेले ही गाँव घूमने निकल जाता था। सब कुछ तो उसे पसंद था ही ! गांव की गलियां, झोपड़े, उससे बाहर निकलते गोरे-काले लोग, गोबर से सने हाथ और कंचे खेलते छोटे-छोटे बच्चे। गांव में किसी को कोई जल्दी नही। सब प्राकृतिक रूप से विचरण करते हैं।
गांव के सटे एक नदी थी। मटमैला पानी उसमे सदा बहता था। वहीँ एक बांस का झुरमुट था। इन दो दिनों में वो,अक्सर यही आकर बैठ जाता। लोगों कोआते-जाते देखता! कभी-कभी बकरियां और गायें भी बगल से चरति हुयी निकल जातीं और उनकी घंटियों की मधुर ध्वनि कानो में कुछ देर गूंजती रहती। वो घंटो बैठा रह जाता। कोई उसके वीराने में खलल न दे वो ऐसा चाहता था। घंटो पानी की लहरों को निहारता, अन्मयस्क सा।
बचपन से ही वो अकेला रहा है। सिर्फ स्कूल और उसके बाद अपने कमरे में पढ़ाई। कमरे की दीवारें ही उसकी मित्र थी। हालांकि उसे सभी सुविधाएँ उपलब्ध थीं, कंप्यूटर , इंटरनेट , किताबें। सब कुछ। उसे पढ़ना और दीवारों को ताकना बहुत अच्छा लगता था। उसके एक या दो ही दोस्त होंगे, वो भी सिर्फ नोट्स एक्सचेंज करने के लिए। लोग उसे सुशील समझते थे। भोला , भोलू ये सब उसके उपनाम बन गए थे। दोस्तों के बीच हंसी मजाक की बातें होती ही रहती है , वह भी उससे अनजान न था , वो सिर्फ मुस्कुरा भर देता। लड़कियां कभी उसकी दोस्त नही बनी शायद वह दूर ही रहा।
जब भी वह अकेले बैठता वह अपने में ही खोया रहता। मन ही मन किसी नावेल के पन्ने पलटता , किसी कैरेक्टर की कल्पना करता।
यहाँ गांव आने के बाद एक बात बहुत अजीब हुई। सब लोग आँगन में बैठे हुए थे ! आपस में बातें कर रहे थे। वह सीढ़ी पे बैठा हुआ उनकी बातें सुन रहा था। कमोबेश सब शादी की ही बातें हो रही थी। आज बारात ले जानी है उसकी तयारी हो रही थी। तभी एक लड़की जिसका नाम परी था वो आयी और उसके गाल को खींच कर ऊपर भाग गयी। वो सन्न रह गया। हज़ारों विचार एक साथ उसके मस्तिष्क में आकर गुजर गए। उसने घबराकर इधर उधर देखा। सब अपने में व्यस्त थे। किसी ने नहीं देखा। उसकी उलझने बढ़ती जा रही थी। वो क्या प्रतिक्रिया दे? प्रत्युत्तर में वह अभी उठ भी नही पाया था। उसे याद आया, ये लड़की उसे देखकर मुस्कुरा देती थी। तब वह निर्विकार भाव से गुजर जाता जैसे कुछ देखा ही न हो। तो क्या यह उस उपेक्षा की प्रतिक्रिया थी?
आज चार बजे से बारात निकलने वाली थी। दो बज चुके थे , वो अभी भी नदी के किनारे बैठा हुआ था बांस के झुरमुट के बगल में। सुबह की घटना उसे विचलित कर रही थी।
विवाह संपन्न हुआ। वर-वधु की विदाई हुई। वो भैया भाभी के साथ ही आ रहा था। कार के पहिये नाच रहे थे। कार के अंदर का माहौल बिलकुल खुला था। ड्राइवर भी भैया के दोस्त ही थे ,खुल के हंसी मजाक हो रहा था। भैया और भाभी में ऐसा कुछ अजनबीपन न दिखा। जैसे बरसों से एक दूजे को जानते हों।। उनकी छवि यूँ बन रही थी मन में, जैसे दो हंस तालाब में विहार कर रहें हों, यूँ दो सफ़ेद कबूतर आसमान के आँचल में होड़ लगा के उड़ रहे हों, अठखेलिया कर रहे हों ! बातें तो पहले भी हुई होंगी, अब तो मिलन होगा। ये गुदगुदा देने वाला एहसास था। वो
अस्तु, हम गांव वापस लौटे! वो ड्राइवर के साथ आगे बैठा था, भैया और भाभी पीछे। दरवाजे पर बहुत भीड़ थी। उसकी कार को घेर लिया गया! महिलाएं गीत गाने लगीं और बहु के गृहप्रवेश के रस्म किये जाने लगे। वर-वधु की आरती हुई, टीका लगाया गया ! आरती उतारने में अगर कोई सबसे बढ़-चढ़ के भाग ले रहा था तो वो परी थी। सोलह श्रृंगार में, उसके उपन्यास की नायिका जैसी। लंबी, गोरी, यौवन से भरी वह उसके करीब आती जा रही थी मन में। आज उसने काफी समय बिताया होगा आईने के सामने। होठ और उसपे लगी कृत्रिम लाली और अंदर से झलकती सुन्दर दन्तपंक्तियाँ, बिलकुल हॉलीवूड नायिकाओं जैसी, उसे बरबस ही कल्पना के सागर में गोते लगवा रही थी। उसने सोचा था किसी तरह आज की रात गुजार कर वो शहर लौट जायेगा,पर उसे कहा पता था की वो जकड जायेगा, मोहपाश में, उसके रूपजाल में। बेचैन सा। वो चुपचाप देखता रहा, शायद उस तत्व को खोज रहा था जो उसके अंदर अभिक्रिया करने को उत्प्रेरित कर रहा हो।
भैया भाभी की आरती हुई उन्हें घर ले जाया जाने लगा ! लड़कियों ने अच्छा खासा नेग लिया, इस काम के बदले। वो भी भीड़ घटते देख उतरने ही वाला था कि परी के इशारे पर लड़कियों के गैंग ने उसे घेर लिया। उसकी भी आरती उतारी गयी। बला तो तब आयी जब उससे नेग की मांग हुई। लड़कियों के दो ग्रुप थे, एक गांव की सहेलिया, और दूसरी उसकी बहनें। ये तो बड़ी बला थी। पैसे उसके पास कम ही होते थे , जो जरूरत हुई पापा से मांग लिया। उसने ड्राइवर भैया की तरफ बेबस नज़रों से देखा !वो हंस के बोले, दे दो आखिर तुम भी तो दूल्हे के भाई हो। उन्हें क्या पता की उसकी जेबें आज उतनी ही खाली थीं जितना उसका मन अशांत था। तभी याद आया की भैया की सास ने विदाई के समय उसकी जेब में कुछ डाला था। उसने जेबें टटोली,ये ५०० का नोट था। उसने आगे बढ़ा दिया। परी ने वो नोट सहेलियों को दे दिया और कहा की मेरा नेग दो। उसने नजरें नीची कर ली! वो बोली " उधार रहा , बिना दिए चले मत जाना "! उसने देखा, दुनिया इस बात को हल्के में ले रही थी, वो अकेला ही इस शब्दजाल में फंसा जा रहा था।
"उधार रहा,बिना दिए चले मत जाना।" सब चले गए वो अकेला ही इन शब्दों का आशय स्पष्ट करने में लगा था!
अभी बारह बजे थे। सभी लोग आ चुके थे बारात से। वो भी नहा धो के तैयार हो गया। भोजन किया और निकल पड़ा अपने ठिकाने पर। आज भी नदी निर्विकार भाव से बाह रही थी। मंद मंद पवन उसकी कल्पनाओं की तीव्रता कम करना चाहता था। बांस के झुरमुट से आ रही भिन्न-भिन्न आवाजें उसका ध्यान भंग करने की असफल कोशिस कर रही थी। कहाँ मगन है वो? बताने की जरूरत नही। ये अप्रत्याशित बदलाव उसके विचारों में बवंडर की तरह उठ रहा था। जिस किनारे ने सिर्फ समुन्दर की लहरों के थपेड़े सहे हों ,तूफान का अनुभव तो नवीन होगा ही पर किनारे कहा भाग सकते हैं। फिर उन्हें डर भी है की तुफानो की तेजी उसके अस्तित्व को ही चकनाचूर न कर दे।
2 बज रहे होंगे। वो घर जाने के लिए उठ गया। व्यग्रता हृदय में थी, मौन कदमो से वो दुरी कम करता चला जा रहा था। एक एक कदम, उसके मन में ख़ुशी के दिए जला रहे थे। एकांत का अँधेरा छंट रहा था ।
घर पे उसकी नज़रे उसे ही खोजती रही। जैसा उसका नाम था परी उतनी ही खूबसूरत, उतनी ही चंचल। उसके हाथों में तेजी थी वह दौड़ दौड़ कर घर के सभी कामो को निपटा रही थी। वह आँगन के एक कोने में बैठ फेसबुक चलाने के बहाने अपनी कुंठा की तृप्ति करने का असफल प्रयास कर रहा था। वो कुंठा जो वर्षों से दबी हुई थी! जिसपे एकांत, बादलों की तरह छाया हुआ था आज कामना की आंच से तप्त हो रही थी। अस्तु । शिव जाने। क्या इच्छा है नियति की ।
--------- ---------- ------------ ---------- ------
दिन में तो वह नदी किनारे चला जाता पर शाम को वह रोज छत पे जा बैठता क्योंकि छत पर नेटवर्क भी थोडा ठीक मिल जाता था। इसी समय वह फेसबुक, व्हाट्सएप्प वगैरह चलाता और हैडफ़ोन लगाकर संगीत सुनता रहता था। इस काम में वह देर तक लगा रहता, हालाँकि इतनी ज्यादा संगीत और सोशल मीडिया की लत उसे नही थी पर कोई काम न होने और देर रात तक जागने की आदत के कारण वो छत पे ही बैठा रहता। कभी तो मोबाइल की बैटरी ख़त्म होने के बाद ही छत से उतरता ।
पर आज की बात अलग थी आज उसे किसी का इंतज़ार था । निगाहों निगाहों में किसी ने उसका आमंत्रण स्वीकार किया होगा ऐसी उसे उम्मीद थी।
शाम के करीब सात बजे होंगे । अँधेरा हो चूका था ।छत पे कोई न था पर नीचे बड़ी चहल पहल थी ।मेहमान कई अभी भी नही गए थे ।आज तो बड़े भैया की सुहागरात है । सब उसी की तैयारी में जुटे थे । सब औरतें घर दहेज़ का सामान सजाने कम और देखने में ज्यादा लगी थी की क्या मिला है ?
चाची के चेहरे पे शिकायत के जख्म थे । उनके कई प्रलोभनों का अवसान जो हो चूका था।उसे भी एक बार बुलाया गया पलंग ठीक करने के लिए, क्योंकि पलंग बहुत बड़ा था और ये काम औरतों के बस का नही था। घर के बड़े मर्द तो बहु के कमरे में जा नही सकते थे तो उसे और एक और लड़के को बुलाया गया। भाभी वही एक सोफे पे बैठी थी ।पलंग सेट करने के क्रम में परी कितनी बार ही उसके आस पास मंडराई थी, कही ये उसके भ्रम तो नहीं !
वह प्रतीक्षा में बैठा रहा! फ़रवरी का आखिरी सप्ताह था, ठन्डे हवा के झोके शरीर को गनगना देते थे पर मिलन की उष्ण उमंग उसे निराश होने से बचा लेती थी! उसके मन में सैकड़ो विचार कौंध रहे थे, पर क्या होने वाला था ये तो सिर्फ दैव ही जानता था! "छू लेने दो नाजुक होठों को, कुछ और नहीं हैं जाम है ये" नगमा हलकी ध्वनि में छत के मौन से संघर्षरत था! हलकी ठण्ड, थोड़ी आशा,थोड़ी निराशा,और अनिश्चितता ये सब मिलकर उसे उलझा रहे थे! कुछ नया, जो होने वाला था ,ऐसा ही कुछ अंदेशा उसके मन में दस्तक दे रहा था! आखिर वो घडी आ ही गयी, कुछ साढ़े सात बजे होंगे!
वो आई और बगल में बैठ गयी. उसके हाथों में चाय का कप था! उसने कप किनारे रखा और चुपचाप मोबाइल में झाँकने लगी!
"क्या कर रही थी ?"
"कुछ नही वो खाना बनाने की तयारी हो रही थी तो मैं भी हाथ बंटा रही थी "
"और पहले नहीं आ सकती थी " इसने अधिकार पूर्वक कहा .
"क्यों कुछ काम था क्या ?" उसने शोखी भरे अंदाज में कहा . दोनों की नजरे मिलीं . ऐसा सम्मोहन वो चेतनाशुन्य न हो जाये. एकाएक वो आगे झुका और उसने परी के गालों को चूम लिया .. घुप्प ख़ामोशी छाई थी . वो नज़रें नीची किये बैठी रही . शायद उसे आभास हो ..
पर इसे क्या हुआ ? ये तो जैसे जड़ ही हो गया .
१० सेकेण्ड ... २० सेकेण्ड .. ३० सेकेण्ड ... ६० सेकंड ! वो बैठी रही चुपचाप, नज़रें नीची किये! उसके खुले बाल उसके चेहरे को छूपा रहे थे! उसके शरीर में जरा भी स्पंदन न था ! ये मौन स्वीकृति थी, पर सामने वाला तो होश ही खो बैठा था ! परी ने नज़रें उठाकर इसके जर्द चेहरे की ओर देखा . फिर वो चली गयी.
ये बैठा रहा, खुद के सामान्य होने की प्रतीक्षा में! घंटों ...
अगली सुबह पापा का फ़ोन आया, उसका आज ही शहर जाना निर्धारित था . पर क्या वो खुद को अधूरा प्रस्तुत कर चला जायेगा! वो क्या सोचेगी? आखिर विश्वास तो उसे भी है, तभी तो वो आई थी, एकान्त.....छत पर! अवश्य उसके मन में भी ,क्या ? प्यार ? ये अनुभूति सुखद थी ! कोई उसके बारे में भी सोच रहा है !
आज नदी के किनारे एकांत का नहीं प्रेम का मौसम रहा! रोमांटिक फिल्मो के दृश्य उभर आ रहे थे! आज उसके चेहरे पे चमक थी , कुछ तय कर चूका था वो . जैसे कोई नए कपडे को देखकर पुराने कपडे के प्रति उदासीन हो जाता है इसी तरह एकांत की उसकी पुरानी चादर आज उदासीन और फ़ीकी सी प्रतीत हो रही थी !
आगे पढने के लिए प्रतिक्रिया अवश्य दें , की आपको ये कहानी कैसी लगी !
ये कहानी एक ऐसे लड़के की है, जो बहुत ही भोला है! अकेले रहना उसे अच्छा लगता है! या यूँ कहिये की वो बचपन से अकेला ही है। एकांतप्रिय।
वो भाई की शादी में गांव जाता है। वहां उसकी मुलाकात होती है एक लड़की परी से। वो इसे भा जाती है पर वो इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पाता। जानिये क्या होता है उस रात में ...
आज वह बहुत खुश है, क्योंकि वो अपने गांव जा रहा है। पापा उसे गांव नही जाने देते। बचपन से ही शहर में रहा है। मुश्किल से ६ या ७ बार गांव गया होगा। उसे अपना गांव बहुत पसंद है। लोगो का व्यवहार, उनका अपनापन बिलकुल असली सा ,कतई भी मिलावटी नहीं। जो मधुरता गांव की हवा में घुली है वो शहर में कहाँ। उसकी नजर में, गांव के लोग, यानि दहेड़ी में जमाई गई सजाई दही, और शहर के लोग, खट्टे छांछ (मठ्ठा) की तरह ( जिसे हम कभी कभी डॉक्टर के कहने पर स्वास्थ्य के नाम पर भुने हुए जीरे के साथ पी लेते हैं ).
इस बार वो अपने चचेरे भाई की शादी में गांव आया है। सब लोग जुटे हुए हैं शादी की तैयारी में। प्रणाम-अभिनन्दन कर वो भी एक कोना पकड़ के सब तैयारियों को देख रहा है। यहाँ उसका कोई मित्र नहीं,और सब लोग भी उसके एकांतप्रियता को जानते हैं। अभी शादी में दो दिन बाकि हैं ! तिलक हो चूका, तिलक में वो आ नहीं पाया था। उसका एग्जाम जो था बनारस में।
ये फ़रवरी का महीना है अभी हलकी-हलकी ठण्ड पड़ रही है।
वो अकेले ही गाँव घूमने निकल जाता था। सब कुछ तो उसे पसंद था ही ! गांव की गलियां, झोपड़े, उससे बाहर निकलते गोरे-काले लोग, गोबर से सने हाथ और कंचे खेलते छोटे-छोटे बच्चे। गांव में किसी को कोई जल्दी नही। सब प्राकृतिक रूप से विचरण करते हैं।
गांव के सटे एक नदी थी। मटमैला पानी उसमे सदा बहता था। वहीँ एक बांस का झुरमुट था। इन दो दिनों में वो,अक्सर यही आकर बैठ जाता। लोगों कोआते-जाते देखता! कभी-कभी बकरियां और गायें भी बगल से चरति हुयी निकल जातीं और उनकी घंटियों की मधुर ध्वनि कानो में कुछ देर गूंजती रहती। वो घंटो बैठा रह जाता। कोई उसके वीराने में खलल न दे वो ऐसा चाहता था। घंटो पानी की लहरों को निहारता, अन्मयस्क सा।
बचपन से ही वो अकेला रहा है। सिर्फ स्कूल और उसके बाद अपने कमरे में पढ़ाई। कमरे की दीवारें ही उसकी मित्र थी। हालांकि उसे सभी सुविधाएँ उपलब्ध थीं, कंप्यूटर , इंटरनेट , किताबें। सब कुछ। उसे पढ़ना और दीवारों को ताकना बहुत अच्छा लगता था। उसके एक या दो ही दोस्त होंगे, वो भी सिर्फ नोट्स एक्सचेंज करने के लिए। लोग उसे सुशील समझते थे। भोला , भोलू ये सब उसके उपनाम बन गए थे। दोस्तों के बीच हंसी मजाक की बातें होती ही रहती है , वह भी उससे अनजान न था , वो सिर्फ मुस्कुरा भर देता। लड़कियां कभी उसकी दोस्त नही बनी शायद वह दूर ही रहा।
जब भी वह अकेले बैठता वह अपने में ही खोया रहता। मन ही मन किसी नावेल के पन्ने पलटता , किसी कैरेक्टर की कल्पना करता।
यहाँ गांव आने के बाद एक बात बहुत अजीब हुई। सब लोग आँगन में बैठे हुए थे ! आपस में बातें कर रहे थे। वह सीढ़ी पे बैठा हुआ उनकी बातें सुन रहा था। कमोबेश सब शादी की ही बातें हो रही थी। आज बारात ले जानी है उसकी तयारी हो रही थी। तभी एक लड़की जिसका नाम परी था वो आयी और उसके गाल को खींच कर ऊपर भाग गयी। वो सन्न रह गया। हज़ारों विचार एक साथ उसके मस्तिष्क में आकर गुजर गए। उसने घबराकर इधर उधर देखा। सब अपने में व्यस्त थे। किसी ने नहीं देखा। उसकी उलझने बढ़ती जा रही थी। वो क्या प्रतिक्रिया दे? प्रत्युत्तर में वह अभी उठ भी नही पाया था। उसे याद आया, ये लड़की उसे देखकर मुस्कुरा देती थी। तब वह निर्विकार भाव से गुजर जाता जैसे कुछ देखा ही न हो। तो क्या यह उस उपेक्षा की प्रतिक्रिया थी?
आज चार बजे से बारात निकलने वाली थी। दो बज चुके थे , वो अभी भी नदी के किनारे बैठा हुआ था बांस के झुरमुट के बगल में। सुबह की घटना उसे विचलित कर रही थी।
विवाह संपन्न हुआ। वर-वधु की विदाई हुई। वो भैया भाभी के साथ ही आ रहा था। कार के पहिये नाच रहे थे। कार के अंदर का माहौल बिलकुल खुला था। ड्राइवर भी भैया के दोस्त ही थे ,खुल के हंसी मजाक हो रहा था। भैया और भाभी में ऐसा कुछ अजनबीपन न दिखा। जैसे बरसों से एक दूजे को जानते हों।। उनकी छवि यूँ बन रही थी मन में, जैसे दो हंस तालाब में विहार कर रहें हों, यूँ दो सफ़ेद कबूतर आसमान के आँचल में होड़ लगा के उड़ रहे हों, अठखेलिया कर रहे हों ! बातें तो पहले भी हुई होंगी, अब तो मिलन होगा। ये गुदगुदा देने वाला एहसास था। वो
अस्तु, हम गांव वापस लौटे! वो ड्राइवर के साथ आगे बैठा था, भैया और भाभी पीछे। दरवाजे पर बहुत भीड़ थी। उसकी कार को घेर लिया गया! महिलाएं गीत गाने लगीं और बहु के गृहप्रवेश के रस्म किये जाने लगे। वर-वधु की आरती हुई, टीका लगाया गया ! आरती उतारने में अगर कोई सबसे बढ़-चढ़ के भाग ले रहा था तो वो परी थी। सोलह श्रृंगार में, उसके उपन्यास की नायिका जैसी। लंबी, गोरी, यौवन से भरी वह उसके करीब आती जा रही थी मन में। आज उसने काफी समय बिताया होगा आईने के सामने। होठ और उसपे लगी कृत्रिम लाली और अंदर से झलकती सुन्दर दन्तपंक्तियाँ, बिलकुल हॉलीवूड नायिकाओं जैसी, उसे बरबस ही कल्पना के सागर में गोते लगवा रही थी। उसने सोचा था किसी तरह आज की रात गुजार कर वो शहर लौट जायेगा,पर उसे कहा पता था की वो जकड जायेगा, मोहपाश में, उसके रूपजाल में। बेचैन सा। वो चुपचाप देखता रहा, शायद उस तत्व को खोज रहा था जो उसके अंदर अभिक्रिया करने को उत्प्रेरित कर रहा हो।
भैया भाभी की आरती हुई उन्हें घर ले जाया जाने लगा ! लड़कियों ने अच्छा खासा नेग लिया, इस काम के बदले। वो भी भीड़ घटते देख उतरने ही वाला था कि परी के इशारे पर लड़कियों के गैंग ने उसे घेर लिया। उसकी भी आरती उतारी गयी। बला तो तब आयी जब उससे नेग की मांग हुई। लड़कियों के दो ग्रुप थे, एक गांव की सहेलिया, और दूसरी उसकी बहनें। ये तो बड़ी बला थी। पैसे उसके पास कम ही होते थे , जो जरूरत हुई पापा से मांग लिया। उसने ड्राइवर भैया की तरफ बेबस नज़रों से देखा !वो हंस के बोले, दे दो आखिर तुम भी तो दूल्हे के भाई हो। उन्हें क्या पता की उसकी जेबें आज उतनी ही खाली थीं जितना उसका मन अशांत था। तभी याद आया की भैया की सास ने विदाई के समय उसकी जेब में कुछ डाला था। उसने जेबें टटोली,ये ५०० का नोट था। उसने आगे बढ़ा दिया। परी ने वो नोट सहेलियों को दे दिया और कहा की मेरा नेग दो। उसने नजरें नीची कर ली! वो बोली " उधार रहा , बिना दिए चले मत जाना "! उसने देखा, दुनिया इस बात को हल्के में ले रही थी, वो अकेला ही इस शब्दजाल में फंसा जा रहा था।
"उधार रहा,बिना दिए चले मत जाना।" सब चले गए वो अकेला ही इन शब्दों का आशय स्पष्ट करने में लगा था!
अभी बारह बजे थे। सभी लोग आ चुके थे बारात से। वो भी नहा धो के तैयार हो गया। भोजन किया और निकल पड़ा अपने ठिकाने पर। आज भी नदी निर्विकार भाव से बाह रही थी। मंद मंद पवन उसकी कल्पनाओं की तीव्रता कम करना चाहता था। बांस के झुरमुट से आ रही भिन्न-भिन्न आवाजें उसका ध्यान भंग करने की असफल कोशिस कर रही थी। कहाँ मगन है वो? बताने की जरूरत नही। ये अप्रत्याशित बदलाव उसके विचारों में बवंडर की तरह उठ रहा था। जिस किनारे ने सिर्फ समुन्दर की लहरों के थपेड़े सहे हों ,तूफान का अनुभव तो नवीन होगा ही पर किनारे कहा भाग सकते हैं। फिर उन्हें डर भी है की तुफानो की तेजी उसके अस्तित्व को ही चकनाचूर न कर दे।
2 बज रहे होंगे। वो घर जाने के लिए उठ गया। व्यग्रता हृदय में थी, मौन कदमो से वो दुरी कम करता चला जा रहा था। एक एक कदम, उसके मन में ख़ुशी के दिए जला रहे थे। एकांत का अँधेरा छंट रहा था ।
घर पे उसकी नज़रे उसे ही खोजती रही। जैसा उसका नाम था परी उतनी ही खूबसूरत, उतनी ही चंचल। उसके हाथों में तेजी थी वह दौड़ दौड़ कर घर के सभी कामो को निपटा रही थी। वह आँगन के एक कोने में बैठ फेसबुक चलाने के बहाने अपनी कुंठा की तृप्ति करने का असफल प्रयास कर रहा था। वो कुंठा जो वर्षों से दबी हुई थी! जिसपे एकांत, बादलों की तरह छाया हुआ था आज कामना की आंच से तप्त हो रही थी। अस्तु । शिव जाने। क्या इच्छा है नियति की ।
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दिन में तो वह नदी किनारे चला जाता पर शाम को वह रोज छत पे जा बैठता क्योंकि छत पर नेटवर्क भी थोडा ठीक मिल जाता था। इसी समय वह फेसबुक, व्हाट्सएप्प वगैरह चलाता और हैडफ़ोन लगाकर संगीत सुनता रहता था। इस काम में वह देर तक लगा रहता, हालाँकि इतनी ज्यादा संगीत और सोशल मीडिया की लत उसे नही थी पर कोई काम न होने और देर रात तक जागने की आदत के कारण वो छत पे ही बैठा रहता। कभी तो मोबाइल की बैटरी ख़त्म होने के बाद ही छत से उतरता ।
पर आज की बात अलग थी आज उसे किसी का इंतज़ार था । निगाहों निगाहों में किसी ने उसका आमंत्रण स्वीकार किया होगा ऐसी उसे उम्मीद थी।
शाम के करीब सात बजे होंगे । अँधेरा हो चूका था ।छत पे कोई न था पर नीचे बड़ी चहल पहल थी ।मेहमान कई अभी भी नही गए थे ।आज तो बड़े भैया की सुहागरात है । सब उसी की तैयारी में जुटे थे । सब औरतें घर दहेज़ का सामान सजाने कम और देखने में ज्यादा लगी थी की क्या मिला है ?
चाची के चेहरे पे शिकायत के जख्म थे । उनके कई प्रलोभनों का अवसान जो हो चूका था।उसे भी एक बार बुलाया गया पलंग ठीक करने के लिए, क्योंकि पलंग बहुत बड़ा था और ये काम औरतों के बस का नही था। घर के बड़े मर्द तो बहु के कमरे में जा नही सकते थे तो उसे और एक और लड़के को बुलाया गया। भाभी वही एक सोफे पे बैठी थी ।पलंग सेट करने के क्रम में परी कितनी बार ही उसके आस पास मंडराई थी, कही ये उसके भ्रम तो नहीं !
वह प्रतीक्षा में बैठा रहा! फ़रवरी का आखिरी सप्ताह था, ठन्डे हवा के झोके शरीर को गनगना देते थे पर मिलन की उष्ण उमंग उसे निराश होने से बचा लेती थी! उसके मन में सैकड़ो विचार कौंध रहे थे, पर क्या होने वाला था ये तो सिर्फ दैव ही जानता था! "छू लेने दो नाजुक होठों को, कुछ और नहीं हैं जाम है ये" नगमा हलकी ध्वनि में छत के मौन से संघर्षरत था! हलकी ठण्ड, थोड़ी आशा,थोड़ी निराशा,और अनिश्चितता ये सब मिलकर उसे उलझा रहे थे! कुछ नया, जो होने वाला था ,ऐसा ही कुछ अंदेशा उसके मन में दस्तक दे रहा था! आखिर वो घडी आ ही गयी, कुछ साढ़े सात बजे होंगे!
वो आई और बगल में बैठ गयी. उसके हाथों में चाय का कप था! उसने कप किनारे रखा और चुपचाप मोबाइल में झाँकने लगी!
"क्या कर रही थी ?"
"कुछ नही वो खाना बनाने की तयारी हो रही थी तो मैं भी हाथ बंटा रही थी "
"और पहले नहीं आ सकती थी " इसने अधिकार पूर्वक कहा .
"क्यों कुछ काम था क्या ?" उसने शोखी भरे अंदाज में कहा . दोनों की नजरे मिलीं . ऐसा सम्मोहन वो चेतनाशुन्य न हो जाये. एकाएक वो आगे झुका और उसने परी के गालों को चूम लिया .. घुप्प ख़ामोशी छाई थी . वो नज़रें नीची किये बैठी रही . शायद उसे आभास हो ..
पर इसे क्या हुआ ? ये तो जैसे जड़ ही हो गया .
१० सेकेण्ड ... २० सेकेण्ड .. ३० सेकेण्ड ... ६० सेकंड ! वो बैठी रही चुपचाप, नज़रें नीची किये! उसके खुले बाल उसके चेहरे को छूपा रहे थे! उसके शरीर में जरा भी स्पंदन न था ! ये मौन स्वीकृति थी, पर सामने वाला तो होश ही खो बैठा था ! परी ने नज़रें उठाकर इसके जर्द चेहरे की ओर देखा . फिर वो चली गयी.
ये बैठा रहा, खुद के सामान्य होने की प्रतीक्षा में! घंटों ...
अगली सुबह पापा का फ़ोन आया, उसका आज ही शहर जाना निर्धारित था . पर क्या वो खुद को अधूरा प्रस्तुत कर चला जायेगा! वो क्या सोचेगी? आखिर विश्वास तो उसे भी है, तभी तो वो आई थी, एकान्त.....छत पर! अवश्य उसके मन में भी ,क्या ? प्यार ? ये अनुभूति सुखद थी ! कोई उसके बारे में भी सोच रहा है !
आज नदी के किनारे एकांत का नहीं प्रेम का मौसम रहा! रोमांटिक फिल्मो के दृश्य उभर आ रहे थे! आज उसके चेहरे पे चमक थी , कुछ तय कर चूका था वो . जैसे कोई नए कपडे को देखकर पुराने कपडे के प्रति उदासीन हो जाता है इसी तरह एकांत की उसकी पुरानी चादर आज उदासीन और फ़ीकी सी प्रतीत हो रही थी !
आगे पढने के लिए प्रतिक्रिया अवश्य दें , की आपको ये कहानी कैसी लगी !


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