प्रियतमा,
तुम जहाँ कहीं भी हो, खुश रहो! अभी कल ही तो मुलाकात हुई थी सपनो में! थोड़ी से ख़ुशी भी मुझसे बर्दास्त नही होती! शब्दों में छलक जाती है! क्या आज भी मेरे सपनो में आओगी? प्लीज् आ जाना! बस यही कुछ पल की रातें मेरी अपनी हैं ! इन्ही पलों के गुनगुनाते स्पर्श से बाकि दिन कटा करता है! सुनो, शायद तुम्हे याद नही, पर आज वो रात याद आ रही है? तुम तो शायद भूल भी गयी होगी, पर मैं क्या भूल पाऊँगा कभी! वो रात इतनी मीठी है की कल्पना से ही जी उठता हूँ मैं! जीवंत हो जाती हो तुम, और मैं अदृश्य सा खो जाता हूँ उस रात के अँधेरे में , तीन साल के फासले पार कर गर्मी की उस रात में तेरे छत पर, खुद को पाता हूँ!

हां तुम सो गयी थी! पर मैं क्या सो पाया था? सोंचा आज बयां कर दूं, उतार दूं, ये बोझ भी! पर संभव नही! काँप रही हैं उंगलिया! नही कर सकता दूर, तुम्हे खुद से! संभव नही! अब जबकि तुम मेरे साथ नही और ये मिलन अगले सात जन्मों तक संभव नहीं, फिर भी कहे देता हूँ! नहीं कहूँगा, तो जी नही पाऊँगा! लिख रहा हूँ, कभी तुम तक मेरी बात पहुंचे तो.... काश , सिर्फ एक बात कहना चाहता हूँ, की पहले से हज़ार गुना ज्यादा प्यार करता हूँ तुम्हे! ये समझ लो की तेरे अस्तित्व की प्रतिकृति बहुत गहराई में उतर चुकी है मुझमे! मेरे ह्रदय के गहरे जल में!

क्या मैं सोया था उस रात? हां, अभी-अभी तो स्वीकार किया था तुमने मेरा प्रेम निमंत्रण, नज़रों से, जो अभी शब्दों में उच्चारित नही हो पाया था! दिन भर की तप्त छत शाम को पानी उड़ेलने से सोंधी महक रही थी! मैं मदहोश हुआ जा रहा था तुम्हारी उपस्थिति से! सब लोग अभी जगे हुए थे! लालटेन की रौशनी में तुम छोटा सा मुखड़ा सुनहला प्रतीत हो रहा था! अपने भाई को पढ़ा रही थी तुम, जब भी डांट पड़ती उसे, मुझे लगता मैं ही सामने हूँ! मुझे ही सीखा रही हो थी तुम प्यार करना! और अन्तराल पर, तुम्हारा ये देखना की मेरी नजरें कहा हैं, याद है मुझे!

याद है, जब सो गए थे सब! तब तुम लेटी थी अपनी बहन के साथ! मैं निहार रहा था घुप्प अँधेरे से छन कर आती तुम्हारी तस्वीर को, और तुम दिला रही थी एहसास खुद के जगे होने का, करवटें बदल कर! उस रात मैंने करवट नहीं बदली! जानती हो क्यों? क्योंकि डर रहा था मैं, की कहीं मेरी बेचैनी चीख कर जगा न दें उन लाशों को जो तेरे और मेरे बीच सोये हुए थे! हाँ, उस रात अनंत दूरी का आभास हुआ था! वो वेदना,जो उस रात उठी थी हृदय में, उसे मैंने स्थायी रख लिया है अपने अंतर्मन में!

हाँ लाशें ही कहूँगा मैं उन्हें, कोई संवेदना नही! मरे हुए लोग हैं! प्रेम का कोई मोल नहीं इनकी नजर में, पैसे का मोल है! मैंने भी ठान लिया है , पैसे कमाऊँगा, जिन्दा लाश बन कर, अब प्यार मैं इन्हें नहीं दे पाऊँगा! याद है, हमारे रोने से भी नहीं माने थे ये !मैं भी नही मानूंगा! प्रयास में हूँ, बहुत दूर जाना चाहता हूँ! दूर बहुत दूर! दुनिया छोड़ कर भी जाने से डर नही! कोई कामना नहीं रही अब!

तुम भी तो दूर हो मुझसे! ये सोचते ही दुनिया नीरस लगने लगती है! लगता है, सब कुछ त्याग दूं! सन्यासी बन जाऊं, मारा-मारा फिरू, सड़कों पर आवारा! ऐसा सो जाऊं की फिर जगने की आवश्यकता न हो! ये दर्द सहा नही जाता! काश तुम लौट आती! कम से कम एक बार दिख जाती! मैं तुम्हे से सीने से लगा लेता ! सौ बार माफ़ी मांगता ! मैंने भी तुम्हे बहुत दर्द दिया है! हां, मुझे सारी बातें याद आ रहीं हैं! तुम्हे बहुत रुलाया है मैंने ! तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेकर कहना चाहता हूँ की मुझे माफ़ कर दो! काश...