अस्सी।
उसका सन्देश मिलते ही मैं अस्सी की तरफ चल पड़ा। मैं और मेरा मित्र बनारस की भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़े। अस्सी, रविवार 12 मई 2024, गर्मी बेतहाशा,दिन भर की तपन के बाद बनारस के गलियों की सांस फूल रही थी । पर अस्सी पर आते ही ठंडी हवाएं दिल ओ दिमाग को सुकून पहुंचाने लगी। इंतजार तो उसका ही था, अस्सी तो हमारे पहले मिलन का साक्षी भर था। मैं पान खा के चबूतरे पर बैठ गया। सामने आरती का प्रबंध चल रहा था। मां गंगा की ओर से आने वाली ठंडी हवाएं उसके इंतजार से होने वाली व्यथा को न्यून कर रही थी ।
उसका सन्देश आया, वो आ चुकी थी। घाट के नीचे गंगा किनारे कहीं पर। हम लोग उधर ही आगे बढ़े। वो मिली । सफेद सलवार सूट में थी वो, मैं करीब 50 फीट की दूरी पर था। उसका चेहरा आधा ही दिख रहा था थोड़ा धुंधला, मैं थोड़ा नजदीक जाने लगा। उसकी दो तीन और बहने, एक बच्चा भी साथ में था। तभी वो मुड़ी, कुछ दूरी से मैने देखा, गोरा कांतिमय चेहरा, जो थोड़ा गर्मी से कुम्हला गया था, सुंदर दंतपंक्तियों वाली वो लड़की किसी बात पे हंस रही थी। लंबे लंबे बाल संवारती वो, नजर बचाकर, कभी इधर उधर देख लेती। उसकी नज़रे मुझे ढूंढ रही थी। वो बार अपने बालों को सवार रही थी जो उसकी बेचैनी को दर्शा रहा था। छरहरी काया, पतली कमर और सुराहीदार गर्दन इतनी सुंदर जैसे स्वर्ग की अप्सरा उतर आई हो। एक पल के लिए मैं ठिठक गया। थोड़ा रुका। आंखे बंद कर उसके रूप की प्रतिकृति को अपने जेहन में समेटने का प्रयास करने लगा। तभी उसने मुझे देखा, और सेकंड के हजारवें हिस्से में ही नज़रे फेर ली। पहचान लिया मुझे। अब उसके चेहरे पर इत्मीनान था की मैं आ गया था।
उसका मेरा रिश्ता कुछ अलग सा था। दो साल पहले हम सदा के लिए एक दूसरे के हो जाते पर मेरी नादानी, जो अक्सर मुझसे मेरी कीमती चीज छीन लेती है , हमें एक दूसरे का होने न दिया।
वो अपनी बहनों के साथ घाट किनारे आगे बढ़ने लगी, मैं मंत्रमुग्ध सा उनका अनुशरण कर रहा था और साथ में मित्र। पीछे गंगा आरती हो रही थी, पर मजाल है मुझे कोई मंत्र, आरती, ढोल मंजीरे की आवाज सुनाई दी हो। उसके पास जाते ही भगवान और उसकी भक्ति का प्रभाव न्यून होने लगा। मगन होकर उसके पीछे पीछे जा रहा था। बीच बीच में वो मुझे मुड़कर देख लेती। वो लोग आगे आगे और हम पीछे पीछे। पहली मिलन की साक्षी गंगा का वो पानी दूर तक बह गया होगा, वैसे ही बह रहा था मैं उसके रूप से अभिभूत, घायल मेरी कल्पना में। उत्साह बढ़ रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे वर्षों तपस्या के बाद कोई वरदान मिलने वाला हो, जैसे कोई इच्छा पूरी होने वाली हो । कुछ दूरी पर जाकर वो रुकी। उसकी बातें, उसका मुस्कुराना सुकून दे रहा था। वो मेरी होते होते रह गई थी।
थोड़ी देर गुजारने के बाद वो सब लौटने लगीं। मैंने सन्देश भेजा, "एकांत में मिलोगी नहीं" पर शायद उसने पढ़ा नहीं। अकेले तो थी नहीं, शायद चाहती भी तो मिल नहीं पाती।अस्सी घाट मोड़ पर यातायात जाम लगा था, जाम इतना ज्यादा था कि पैदल वाले भी उसमें फंसे हुए थे। मैने जाम में ही उसके नजदीक जाने का प्रयास किया ताकि उसे अपने करीब होने का अहसास दिला सकूं। पर सफल नहीं हो पाया और वो चली गई। अपनी अदाओं को समेटकर, अस्सी को बीरान कर के, वर्षों से सुने पड़े इस दिल को और सुना करके। वो चली गई, मैं जाना चाहता था उसके पीछे, पूरे रास्ते, दूर तक, जहां तक जाए, जब तक सांस चलती रहे, चेहरे पे झुर्रियां न पड़ जाए, आखिरी मंजिल तक। पर कौन हूं मैं उसका, ये सोचकर कदम ठिठक गए। अब वापस अस्सी जाने का भी इरादा न था। कुछ देर बेचैनी से वहीं टहलता रहा फिर एक सिगरेट सुलगा ली। पसीने की बूंदे, माथे पर चमक रही थी। पीछे से दोस्त ने आके कंधे पे हाथ रखा । इतना बेचैन आपको कभी नहीं देखा, उसने कहा। सिगरेट के धुएं को ऊपर छोड़ते हुए, मैंने सोचा, 20 साल की सुंदर आंखों वाली लड़की दिल चुरा कर चली गई।


0 टिप्पणियाँ
Leave a lovely comment for the True Love Blog.