प्रियतमा, 
एक बात जो अनकही रह गयी, और ऐसी कितनी ही बातें हैं जो मैं तुमसे कहना चाहता हूँ ! जानता हूँ, तुम नहीं हो यहाँ! पर मेरी बातों में सिर्फ तुम ही तुम हो! मेरी रूह में घूल गयी हो तुम! मेरी आत्मा में तुम्हारा वास है!  मैं किसी भी चीज को दो नज़रों से देखने लगा हूँ ! एक तुम्हारी और एक मेरी ! मैं तो हमेशा से उलझा रहा हूँ , तुम्हारी नजर से सुलझ रहा हूँ मैं, देख पा रहा हूँ, ज़माने को , और जमाना भी ये समझ रहा है,, हा हा हा ,, बेकार हो गया हूँ मैं ! छोडो, आओ न, मुझे कुछ कहना है तुमसे !

क्या तुम्हे याद है ?
हमारा पहला मिलन !
मुझे याद है , परियों सी खूबसूरत लगी थी तुम मुझे ! तुम्हारी आवाज में खनक थी ! एक क्षण के लिए , हतप्रभ रह गया था मैं ! बयां नहीं कर सकता, बेचैन हो गया था ! भा गयी थी तुम मुझे , लगा था सिर्फ मेरे लिए बनी हो और यह एहसास पहली बार हुआ था ! उसी क्षण मेरे मन में उमड़ पड़ा था सम्मोहन ! मुझे ऐसा लगा की , तुम खींच रही हो मेरे अस्तित्व को मुझसे दूर , ले जा रही हो मुझे ऊँगली पकड़ के अपने साथ ! क्षण भर के लिए शून्य हो गया था मैं ! चंद लम्हों तक , कुछ सुनाई, कुछ दिखाई न दिया, न ही कुछ समझ पाया मैं तुम्हारा इंद्रजाल ! और जब होश आया तो तुम जा चुकी थी मुझे अपनी समस्त अदाओं से चेतना शून्य करके !

तब मेरे ह्रदय में कम्पन सा होने लगा था , डर गया था मैं ! आभास हुआ था की तुम मिलो या न मिलो मेरा प्यार में डूब जाना तय है ! और यही हुआ भी ! तुमने नही पढ़ा , मैंने सोचा था की तुमसे मिलन के बाद तुम्हे सुनाऊँगा पहली मिलन की कविता ! ... ... तुम मिली नही , कविता रह गयी अनसुनी ...... काश तुम सुन पाती, और मैं सुना पाता तुम्हे ....  भावनाओं का वो ज्वार जो उठा था मेरे हृदय के सागर में .. ये कविता उसकी पहली बूंद थी .. अनसुनी !

कविता :  डरता हूँ ऐ दिल

क्या आप पढना चाहेंगे ? : अंतिम मिलन