प्रियतमा,
उस रात की बात अधूरी रह गई थी, मेरी तरह ! हां सुनो , उस रात में दो बातें हुईं ! पहली, मुझे ये पता चला की मीठा मीठा दर्द कैसा होता है ! बेचैनी कैसी होती है ! उस व्यथा का स्वाद कैसा होता है जब दो प्रेमी चंद कदमों के फासले पर हों और एक दुसरे को आगोश में न ले सकें ! उस रात मेरे और तुम्हारे बीच की दूरी ही कितनी होगी ? कुछ १० या १२ फीट छत जिसके एक छोर पर मैं लेटा था बेचैन और दुसरे छोर पर तुम थी करवटें बदलती हुई ! मौका न मिला ये पूछने का , आज पूछ लेता हूँ ! क्या तुम्हारा करवटें बदलना इस बात का इशारा था की तुम जाग रही हो ? क्या तुम्हे इस बात का आभास था की कोई तुम्हे गहन अँधेरे में निहारने की असफल चेष्टा कर रहा है ? क्या तुम्हे आभास था की तुमने किसी को घायल कर दिया है , और वो आज पूरी रात विरह की वेदना से रातभर कराहता रहेगा ?
जाने दो , मैं जानता हूँ ! तुम क्या कहोगी ! तुम्हारी बेचैनी को साफ़ बयां कर रही थी तुम्हारी करवटें ! छत के दो किनारे और बीच में सागर सी दूरी। उन दो किनारों पर लेटे हम और लहरों से उफान मारता विरह। आह। मन उस नौका की भांति डोल रहा था जो बीच भंवर में फंसी है और पतवार की तरह करवटे बदलती तुम। हां, एक बार मेरे मन में आया था, कि,,, चलो कह ही देता हूँ, की इन फासलों को लाँघ दूं। आ जाऊं तेरे पास, करीब। फिर सोंचा, प्रेम का ऐसा मानमर्दन क्या सही है? क्या मैं तुम्हारी मर्यादा कम होने देता इन नीच जमाने में रहने वालों के सामने।कदापि नही। पर एक बात फिर मन में शेष रह गयी । प्रियतमा, क्या तुम्हारे मन में आयी थी ये बात ?
रात्री शेष थी , आधी रात से कुछ ही ज्यादा बीता होगा, जब मुझे तुम्हारी सुगबुगाहट नज़र न आयी, तब मैं असीम संतुष्टि का रसास्वादन कर रहा था , सोचा चलो, अब ठीक है, कम से कम तुम तो सो जाओ, मुझे क्या ?रहने दो पूरी रात्रि इन सितारों के नीचे खुले नयनो से निहारते हुए अपलक। तुम जरा सो जाओ नींद के आँचल में । जाओ हमारे सुनहले सपने सजाओ मन में। पर मैं गलत था तुम्हारी करवटों ने मुझे गलत साबित कर दिया। तब मुझे लगा था कि तुम मुझे मुझसे भी ज्यादा प्यार करती हो, और बचा खुचा मैं उसी क्षण तुझमें विलीन हो गया था....
सागर के दो किनारे
रात्री शेष थी , आधी रात से कुछ ही ज्यादा बीता होगा, जब मुझे तुम्हारी सुगबुगाहट नज़र न आयी, तब मैं असीम संतुष्टि का रसास्वादन कर रहा था , सोचा चलो, अब ठीक है, कम से कम तुम तो सो जाओ, मुझे क्या ?रहने दो पूरी रात्रि इन सितारों के नीचे खुले नयनो से निहारते हुए अपलक। तुम जरा सो जाओ नींद के आँचल में । जाओ हमारे सुनहले सपने सजाओ मन में। पर मैं गलत था तुम्हारी करवटों ने मुझे गलत साबित कर दिया। तब मुझे लगा था कि तुम मुझे मुझसे भी ज्यादा प्यार करती हो, और बचा खुचा मैं उसी क्षण तुझमें विलीन हो गया था....
सागर के दो किनारे


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