प्रिये ,
आज की शाम बहुत नीरस है ! अनमयस्क सा बैठा हूँ, कोई भाव नहीं है मन में , कोई भावना नहीं ! कोई देखे तो सोचे जैसे गहन विषय का चिंतन कर रहा हूँ ! वास्तविकता यह है, की अवलोकन कर रहा हूँ मैं खुद का , कितना बचा हूँ मैं खुद में ! तुम्हारे जाने के बाद , अपने अस्तित्व को कई बार तौला मैंने, हर बार अपने आप को कुछ हल्का ही महसूस किया लोगो की नज़रों में ! अब आज की शाम की बात ही ले लो, जब आज मैं बाहर से घूम के आया तो भाभी ने पूछा' क्या हुआ है ऐसे मुह लटकाएं हुए हैं ?' मैंने ऐसे ही कह दिया की उसकी बड़ी याद आ रही है ! भाभी ने मुझे हाथ पकड़ के अपने पास बिठा लिया ! उन्होंने जैसे ही मेरा हाथ पकड़ा, मेरी आँखें बरसने लगी ! भाभी भी चकित रह गयीं मैं भी हतप्रभ था ! क्या हुआ मुझे ?
मैं कैसा हो गया हूँ, शायद मुझे भी नही पता! अब शायद तुम भी मुझे पहचान न पाओ! चेहरे से भले ही पहचान जाओगी, पर अब मुझे नही पाओगी! जैसे विना नीर के पौधा पीला पड़ जाता है, वैसे ही सुख रहा हूँ मैं दिन प्रतिदिन! कुछ अच्छा नहीं लगता! न राग है, न रंग, न प्रेम है, न उमंग... कुछ भी नहीं हैं तुम्हारे बिन .. आज एक कविता लिख रहा हूँ अगर कभी पढ़ सको तो समझ पाना यही मेरी हालत है , जिससे कभी तुमने कहा था की आप सबसे अच्छे हो ! यकीन मानो फिर ये शब्द सुनाई नहीं पड़े! क्या मैं ये समझ लूं की तुमने झूठी तारीफ की थी ?
रूक गया हूँ मैं ,
इस सफ़र में
चलते चलते
मीलों तक !
निराशा भरी हवा
और व्यंग भरी मुस्कान
झेलते हुए बेजार
उखड़ी हुई सांसे
और बिखरे हुए बाल
सवांरते सवांरते
अंतर्मन की आवाज
सुनते सुनते
हौंसला बढ़ाते हुए खुद का
और दूसरों का
दर्द देखते देखते
थक गया हूँ मैं
अच्छे नहीं लगते मुझे
प्रियतम के बोल
शादी के ढोल
कोयल की कूक
चिड़ियों का शोर
कहीं मोटर की होड़
बीमार हो गया हूँ मैं,
मन से
इस दुनिया के दर्पण से
बेकार हो गया हूँ मैं !
झूठ बोलते बोलते
डरने लगा हूँ
कही कोई पूछ न दे
अजी! मिजाज कैसा है ?


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