युवावस्था में कई कहानिया बनती है ! कई अधूरी रह जाती हैं ! कई बार हम आधे रस्ते से लौट आते हैं ! और साथ ले आते हैं अनगिनत यादे कुछ खट्टी और कुछ तीखी ! कई बार हमे बाद में अहसास होता है की हमने गलत किया ! अपराध बोध होता है और हम तड़पते हैं की कभी वो मिले और माफ़ी मांग ली जाए ! पर वक़्त के घोड़े पे सवार ये बेदर्द जिंदगी शायद ही वो मौका देती है ! हम अक्सर सोंचते है की जब मैं उसे इतना मिस करता हूँ तो वो भी तो थोडा करता होगा ! और अचानक से कभी जिंदगी हमें मौका देती है और उसे खुश देखकर हम भी खुश हो जाते हैं ! और कविता बनती है ! सरिता के बहाव सी , निष्कपट , निश्छल , और हमे मौका देती है उन लब्जों को कहने की जिसे हम इस जालिम दुनिया के सामने नही कह पाते ! मेरी ये कविता नितांत मेरी है , अकेली , तनहा , और बहती हुई ! इसे दुनिया रोक नहीं सकती जैसे कोई रोक न पाया था मुझे तेरी अदाओं पे रीझ जाने से ! आप भी पढ़े और आनंद ले ! और कभी भी कुछ लहर आपके अंतरतम में उठे उस उद्गार को न रोके ! कहे और खुल कर कहे डेमोक्रेसी है किसी के बाप का राज नहीं ! मेरी कविता ! अच्छा लगा ! तुझे मुस्काते देखकर खिलखिलाते देखकर मन ही मन गुनगुनाते देखकर अच्छा लगा ! चलो मेरे होठो पे हंसी तो आई सीने पे मेरे जो पत्थर रखा था तेरी हंसी ने उसे धुआं कर दिया ! हमने जो तन्हाई पाल रखी थी कुछ महीनो से , कुछ वर्षो से! वो चादर पुरानी लगने लगी अच्छा लगा ! अच्छा लगा , ये जानकर कि तुम भी हंसती हो मेरे बिना जानती हो , मैं खुल कर नही हंसा बरसो से , आज तुम्हे देखकर अच्छा लगा ! हवाएं अच्छी लग रही है धुप पीली हो गयी है गमो के बादल बारिश बन गए हैं भूख भी लग रही है ! अच्छा लगा ! एक बात बोलूं जो महीने गुजारे इस बोझ के साथ की मैं अपराधी हूँ तेरा आज तुम्हारी हंसी से लगा मैं माफ़ हुआ ! अच्छा लगा !