मर्यादा 
कुछ भावनाए हमारे अन्दर ही जन्म लेती हैं और मर्यादा के बंधन में बन्ध कर अन्दर ही रह जाती हैं !
वैसे, मैं एक प्रेमी होने का दंभ भरता हूँ और रसिक लोगों के सहवास में प्रेमी का किरदार भी ठीक ही निभा लेता हूँ ! परन्तु मैं किसका प्रेमी हूँ ?
यह प्रश्न मेरे अंतर्मन में गूंजता रहता है ! 
एक बात याद आती है , किसी ने पूछा था की "अगर दो लोग डूब रहे हो और अगर उनमे से एक वो खास हो जिसे आप बहुत प्यार करते हैं और दूसरा वो जो आपको बहुत प्यार करता है तो आप किसे बचोगे ?
सच पूछिये तो मुझे इसका उत्तर पता नही !
फिर मैंने अपने अन्दर झाँका और इसका उत्तर पाने का प्रयत्न किया , नतीजा सिफ़र रहा ! फिर मैंने कठोर होने का ढोंग किया और कहा की सामान्य वर्ग का अनारक्षित युवा होने के कारण मैं उसी को तालाब से निकालूँगा जो मुझे टूटकर प्यार करेगा , वैसे भी इस समाज की ऐसी की तैसी !  इसे मेरी प्रणय प्रतिभा की क़द्र ही नही इसमें भी आरक्षण घुसेड देगा ~!
अब उस रात की बात करता हूँ ! ac के प्रथम श्रेणी के कम्पार्टमेंट में वो अकेली थी और मैं द्वितीय श्रेणी में ! और उस प्रथम श्रेणी के सभी कम्पार्टमेंट लगभग खाली ही थे ! purani दोस्त होने के कारण मैं उससे मिलने गया ! अकेली लड़की और सुना कम्पार्टमेंट देख कर मैं गंभीर हो गया ! उसने कहा की पुरे boggy में मैं अकेली ही हूँ ! उस obc लड़की की बात को गंभीरता पूर्वक सुनने के बाद मैंने ये तय किया की अब जो भी निर्णय लेना है अपनी प्रतिभा से ही लेना होगा !
हमारे सामने दो विकल्प थे पहला या तो वो मेरे सेकंड ac के सीट पर जाकर यात्रा पूरी करे और मैं यहाँ फर्स्ट ac में रुकू परन्तु इसकी संभावनाएं सीमित थी !
अंत में ,वही हुआ जिसकी संभावनाएं बहुत ही सीमित हैं और वो हुआ ही नहीं  जिसकी संभावनाएं अनंत थी   अब सोचता हूँ तो रोम रोम सिहरने लगता है ! 
खैर , उत्साहित सा मैं सामने की बर्थ पे जा बैठा परन्तु वो उत्साह मेरे चेहरे पे कहीं दिख नहीं रहा था ! अकेली लड़की , सुनसान जंगल !रसिक लोग तो सुन के ही उत्साहित हो गये होंगे ! खैर खुश तो मैं भी था किसी की सहायता भी हो जाएगी , रास्ता भी आराम से कट जायेगा ! और कोई मुझे अन्दर से गुदगुदा रहा था ? वही शैतान जिसे पत्थर मारा जाना चाहिए , मुझमें  एक अजीब सी ख्वाहिश  भर रहा था ! 

दो चार बातें हुई ! कुछ अपनी बातें , कुछ उसकी ! मेरे चेहरे की मुस्कान लगातार माहौल को शंकित बना रही थी ! वो बोल रही थी मैं सुन रहा था ! क्या मैं सुन रहा था ? क्या मैं सुन सकता था ?
Ac की ठंडी हवा और अन्दर की आग, कुल मिला कर फाल्गुन का आभाष हो रहा हो ! मैं भावशुन्य सा बाते सुन रहा था , कर रहा था , क्या कहा , क्या सुना ? ये तो नही पता , परन्तु ये तो अवश्य था की अन्दर ही अन्दर ख्वाहिशे अंगड़ाई ले रही थी और मैं सुन रहा था ! धीरे धीरे ! वो बोल रही थी धीरे धीरे ! रात गहराती जा रही थी और उसके चेहरे की सुन्दरता मुझे मोहती जा रही थी ! बीतता हर एक मिनट मेरी ख्वाहिसों को बढ़ा रहा था ! कुछ ऐसा जैसे शराबी के सामने प्याले में शराब हो और उसे पीने के लिए पल पल उसकी तृष्णा बढ़ रही हो , उसकी आवाज और मीठी , और प्यारी लगने लगी थी , एक ऐसा आवरण मेरे मन मस्तिष्क पे चढ़ गया था और मैं बिलकुल होश खोने लगा था !

एक पल के लिए मैंने आँखे मूंद ली ! पुरे शरीर ने एक गज़ब की अंगड़ाई ली ! एक मीठे दर्द का अभाष किया मैंने और मैं लेट गया , अब मैं बिलकुल अशक्त था ! काम देव के बाण मुझे बिंध रहे थे ! एक पल के बाद ही मेरे जेहन में उसकी तस्वीर उभर आई ! उसके होठ , उसकी कमर , उसकी प्रतिकृति को मैं महसूस कर रहा था ! ऐसा लगा जैसे हमारे बीच कोई दुरी ही नहीं थी ! सदियों से हम एक दूजे के लिए बने थे ! मैं बंद आँखों से उसे महसूस कर रहा था ! सीने पर उसकी उँगलियाँ , बातों का दौर ख़त्म हो चूका था , हवा में मादकता तैर रही थी ! Ac के कुलिंग का कोई प्रभाव नहीं था उसके होठ तप रहे थे और तप रहे थे मेरे होठ ! और एक सुगंध का एहसास लेकर जब हवा टकराती थी तो लगता था की स्वर्ग में हूँ मैं ! मेरी कामना को पंख लग चुके थे और वो भी साथ में उड़ रही थी अपने सतरंगी पंखो के साथ ! मैं उसे छू कर तृप्त होना चाहता था , परन्तु असीम ख्वाहिशें , अनंत सागर में उठने वाले ज्वार , किसी को भी डूबा लेते हैं ! एकाएक उसने मेरे सर को अपने सीने में छूपा लिया ! एक पल , दो पल , पल पल बीत रहा था ! अपने ललाट पे उसका तप्त स्पर्श और घडी सी टिक टिक करती धड़कने मुझे महसूस हो रही थी ! मचल रहा था मैं , अनेक होना व्यर्थ सा लगने लगा , उसी पल लगा की अब एक हो जाऊं ! सीना धौंकनी सा चल रहा था और मैं जोर जोर से साँसे ले रहा था ! बदन लगातार कंप रहा था !एकाएक आंखे खुल गयी ! 

वो एकटक मुझे देख रही थी ! मैंने एक क्षण उसे देखा ! मैं ठहर गया ! आज वो दुनिया की सबसे खूबसूरत , कामदेव की बनाई एक प्रतिमा लग रही थी ! चुपचाप मुझे घूरते देखकर उसने  कहां , आप कांप रहे हैं ,आप भी अजीब हैं , बात करते करते सो गये ! चादर भी नहीं ओढा ! आपको खूब ठंढ लग रही थी ! पत्ते की तरह कांप रहे थे , और मैं पशोपेश में थी , की जगाऊँ की न जगाऊँ ! और उसने मेरा कम्बल मेरी ओर बढ़ा दिया !  

कुछ यादें  मस्तिस्क में इस तरह से बस जाती हैं की आने के बाद चेहरे पे एक प्यारी सी मुस्कान बिखेर देती हैं ! 
बस उस रात मुझे उतना ही सोना था ! फिर मेरी नजरों से जैसे नींद ही गायब हो गयी हो ! और मैं मंत्रमुग्ध सा लेटा हुआ कभी उसे देखता कभी पुरे कम्पार्टमेंट को ! वो भी पुरे कम्बल में थी ! सिर्फ चेहरा बाहर था ! और पलके बंद ! शायद सोने का प्रयास कर रही हो ! मेरे मन मस्तिष्क में विचारों की बाढ़ सी आ गयी थी ! एक ऐसा प्रवाह जो मुझे धकेल रहा था उसकी तरफ ! ........continue