मेरी हालत अजीब हो रही थी ! आज मैं ऐसी लड़की से मिलने जा रहा था जिसे मैं ठीक से जानता तक नही ! हालांकि फ़ोन पर कितनी बार ही बात हुई थी परन्तु फ़ोन पर हुई बात को मैं जान पहचान का जरिया नहीं मानता ! अगर कोई मुझसे फ़ोन पर बात करता है तो जाहिर है मैं मीठी आवाज में (खुद को ज्यादा अच्छा ) दिखाऊंगा परन्तु वास्तविकता ये है नहीं ! मैं बहुत ही झल्ली टाइप का लड़का हूँ ! परन्तु फ़ोन पर नहीं !
हुआ यूँ की कभी ६ साल पहले उसने मुझे देखा था ! तब मैंने उसे नहीं देखा था , क्योंकि वो उस समय बहुत ही छोटी कुछ १३ साल की रही होगी ! या देखा भी होगा तो याद नही , पर उसे ये बात याद थी !
फिर कुछ बातें हुई फेसबुक पर ! आज वो मुझसे मिलने आ रही थी ! बनारस ! इस शहर में रस है ! माधुर्य है , और है प्रेम कहानियां जो की बरबस ही मुझे मोह लेती हैं ! फिर BHU, सामने घाट तो अपना इलाका है ! वैसे शाम के साढ़े चार बजे थे ! मैं बैठा हुआ था , वो आने वाली थी !
वो आई ! एक सावली सी , खूबसूरत आँखों वाली मजबूत लड़की ! मजबूत , यु कहिये जैसे जिम में ढला हुआ बदन हो ! बहुत ही मजबूत आह ! एक मिनट को तो मैं उसे देखता रह गया , चेहरे पे कोई शिकन नही , कोई घबराहट नही ! फिर हम अपने केबिन की ओर बढ़ गये ! रस्ते का नेतृत्व वो कर रही थी ! मैं नहीं ! अनायास सा मैं कयास लगाये जा रहा था ! उसे जानने की मेरी जिज्ञासा बढ़ रही थी ! व्यर्थ होता है , किसी से फ़ोन पर बातें करना , किसी को जानना हो तो उससे मिलो , और आँखों में आँखे डालकर बातें करो ! और जान लो उसे !
हम बैठे ! मैंने देखा , वो बहुत सहज थी ! उसकी सहजता मुझे असहज कर रही थी ! वो मुस्कुरा रही थी ! मैं उसे पढ़ रहा था ! टेबल के इस पार मैं , और उस पार वो ! परन्तु कुछ तो उसके अन्दर भी चल ही रहा होगा ! मैं चकित था क्योंकी वो बात मैं पढ़ नहीं पा रहा था ! अभी कुछ ही मिनट हुए थे ! बिलकुल सन्नाटा था ! कोई आवाज नहीं ! हम दोनों सिर्फ एक दुसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे ! एकाएक वो उठी और मेरे पास आके उसने मुझे कंधे से पकड़ कर खड़ा कर दिया ! और मेरे सीने से लग गयी !
सिर्फ मिलने की बात हुई थी , ऐसा कुछ नही था हमारे बीच ! हालांकि इस बात से मुझे कोई आपत्ति नहीं थी फिर भी उसका इस तरह मिलना मुझे बहुत ही रोमांचित कर रहा था ! अभी तक मैं , खुद से बहुत दूर खड़ा , उसे और खुद को देख रहा था ! अभी पहली बार ऐसा लगा जैसे मैं कही विलुप्त हो गया हूँ ! किसी के बाहूपाश में बंधकर ! वो आलिंगन मुझे अजीब सी ख़ुशी , गर्माहट , रोमांच , मदहोशी से भर रहा था ! वो मुझसे ऐसे चिपकी हुई थी जैसे सदियों से मुझे जानती हो और मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सदियों से मैंने ऐसी ख़ुशी , न पाई हो !
उसने मासूम निगाहों से मेरी तरफ देखा ! और पूछा , मैं आपको कैसी लगी ?
इस सवाल के बाद उसके होठ मेरे होठों से जुड़ चुके थे ! मेरे सोंचने समझने की शक्ति जाती रही ! परन्तु , मेरे मन में उसका सवाल गूंजता रहा ! " मैं आपको कैसी लगी ?" और उसके बाद हमारे होठों का मिलन ! हम करीब थे बेहद करीब ! परन्तु इस सवाल ने मुझे मुझसे दूर कर वही कही खड़ा कर दिया ! " मैं आपको कैसी लगी ?"
ये बात उसने इतने अपनापन से कही थी की मुझे एक डर सा लगने लगा ! क्या इसी क्षण से वो मेरी प्रेमिका है ?
क्या मेरा घुमंतू मन ठहराव प्राप्त करेगा ? या फिर से इस दृश्य को देखकर घूमने निकल जायेगा ? फिर से किसी अनजान पगडण्डी पर , किसी अनजान पहाडी पर ? जाने क्या खोजते हुए ?
उसने मेरी ओर देखा , बोली , आप फोटो में जैसे दीखते हैं उससे ज्यादा अच्छे हैं ! मैं मुस्कुराया और रोया !
मुस्कुराया क्योंकि कोई भी मेरी तारीफ करता है तो मुस्कुरा देता हूँ ! और रोया अपने ह्रदय में , क्योंकी प्रभु ने ऐसा ह्रदय दिया है जो किसी के वश में नहीं जाता ! एक स्थाई विरक्ति सी हो गयी है ! एक पल में रीझ जाता हूँ और दुसरे पल मैं तटस्थ हूँ ! और मैं दूर था , बहुत दूर ! किसी का मुझसे प्यार करना मुझे ही व्यथित कर देता है , किसी का मुझपर रीझ जाना मुझे और व्याकुल कर देता है ! मेरा मन जब मेरे ही वश में नहीं तो कैसे मैं इसे किसी को सौंप दूं ! कल एक पल के लिए किसी और पे रीझ जाये और फिर से वही विरक्त !
एक पाठ ! एक सबक,मैं पढ़ चूका था ! अब मैं जाने के लिए तैयार था , उसकी आँखों में आंसू आ गये ! पर मैं चला आया ! थोड़ा दर्द पी लेना , दर्द के समंदर में डूब जाने से कहीं बेहतर है ! आज वैलेंटाइन डे के अवसर पे अनायास ही मन में आया लिख दिया ! शायद ये टीस कहीं सीने में उठ रही थी ! बेहतर होगा , सांसारिक होने का आभास होने पर ही प्रेम करें क्योंकि विरक्त तो सिर्फ त्याग करता है !
हुआ यूँ की कभी ६ साल पहले उसने मुझे देखा था ! तब मैंने उसे नहीं देखा था , क्योंकि वो उस समय बहुत ही छोटी कुछ १३ साल की रही होगी ! या देखा भी होगा तो याद नही , पर उसे ये बात याद थी !
फिर कुछ बातें हुई फेसबुक पर ! आज वो मुझसे मिलने आ रही थी ! बनारस ! इस शहर में रस है ! माधुर्य है , और है प्रेम कहानियां जो की बरबस ही मुझे मोह लेती हैं ! फिर BHU, सामने घाट तो अपना इलाका है ! वैसे शाम के साढ़े चार बजे थे ! मैं बैठा हुआ था , वो आने वाली थी !
वो आई ! एक सावली सी , खूबसूरत आँखों वाली मजबूत लड़की ! मजबूत , यु कहिये जैसे जिम में ढला हुआ बदन हो ! बहुत ही मजबूत आह ! एक मिनट को तो मैं उसे देखता रह गया , चेहरे पे कोई शिकन नही , कोई घबराहट नही ! फिर हम अपने केबिन की ओर बढ़ गये ! रस्ते का नेतृत्व वो कर रही थी ! मैं नहीं ! अनायास सा मैं कयास लगाये जा रहा था ! उसे जानने की मेरी जिज्ञासा बढ़ रही थी ! व्यर्थ होता है , किसी से फ़ोन पर बातें करना , किसी को जानना हो तो उससे मिलो , और आँखों में आँखे डालकर बातें करो ! और जान लो उसे !
हम बैठे ! मैंने देखा , वो बहुत सहज थी ! उसकी सहजता मुझे असहज कर रही थी ! वो मुस्कुरा रही थी ! मैं उसे पढ़ रहा था ! टेबल के इस पार मैं , और उस पार वो ! परन्तु कुछ तो उसके अन्दर भी चल ही रहा होगा ! मैं चकित था क्योंकी वो बात मैं पढ़ नहीं पा रहा था ! अभी कुछ ही मिनट हुए थे ! बिलकुल सन्नाटा था ! कोई आवाज नहीं ! हम दोनों सिर्फ एक दुसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे ! एकाएक वो उठी और मेरे पास आके उसने मुझे कंधे से पकड़ कर खड़ा कर दिया ! और मेरे सीने से लग गयी !
सिर्फ मिलने की बात हुई थी , ऐसा कुछ नही था हमारे बीच ! हालांकि इस बात से मुझे कोई आपत्ति नहीं थी फिर भी उसका इस तरह मिलना मुझे बहुत ही रोमांचित कर रहा था ! अभी तक मैं , खुद से बहुत दूर खड़ा , उसे और खुद को देख रहा था ! अभी पहली बार ऐसा लगा जैसे मैं कही विलुप्त हो गया हूँ ! किसी के बाहूपाश में बंधकर ! वो आलिंगन मुझे अजीब सी ख़ुशी , गर्माहट , रोमांच , मदहोशी से भर रहा था ! वो मुझसे ऐसे चिपकी हुई थी जैसे सदियों से मुझे जानती हो और मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सदियों से मैंने ऐसी ख़ुशी , न पाई हो !
उसने मासूम निगाहों से मेरी तरफ देखा ! और पूछा , मैं आपको कैसी लगी ?
इस सवाल के बाद उसके होठ मेरे होठों से जुड़ चुके थे ! मेरे सोंचने समझने की शक्ति जाती रही ! परन्तु , मेरे मन में उसका सवाल गूंजता रहा ! " मैं आपको कैसी लगी ?" और उसके बाद हमारे होठों का मिलन ! हम करीब थे बेहद करीब ! परन्तु इस सवाल ने मुझे मुझसे दूर कर वही कही खड़ा कर दिया ! " मैं आपको कैसी लगी ?"
ये बात उसने इतने अपनापन से कही थी की मुझे एक डर सा लगने लगा ! क्या इसी क्षण से वो मेरी प्रेमिका है ?
क्या मेरा घुमंतू मन ठहराव प्राप्त करेगा ? या फिर से इस दृश्य को देखकर घूमने निकल जायेगा ? फिर से किसी अनजान पगडण्डी पर , किसी अनजान पहाडी पर ? जाने क्या खोजते हुए ?
उसने मेरी ओर देखा , बोली , आप फोटो में जैसे दीखते हैं उससे ज्यादा अच्छे हैं ! मैं मुस्कुराया और रोया !
मुस्कुराया क्योंकि कोई भी मेरी तारीफ करता है तो मुस्कुरा देता हूँ ! और रोया अपने ह्रदय में , क्योंकी प्रभु ने ऐसा ह्रदय दिया है जो किसी के वश में नहीं जाता ! एक स्थाई विरक्ति सी हो गयी है ! एक पल में रीझ जाता हूँ और दुसरे पल मैं तटस्थ हूँ ! और मैं दूर था , बहुत दूर ! किसी का मुझसे प्यार करना मुझे ही व्यथित कर देता है , किसी का मुझपर रीझ जाना मुझे और व्याकुल कर देता है ! मेरा मन जब मेरे ही वश में नहीं तो कैसे मैं इसे किसी को सौंप दूं ! कल एक पल के लिए किसी और पे रीझ जाये और फिर से वही विरक्त !
एक पाठ ! एक सबक,मैं पढ़ चूका था ! अब मैं जाने के लिए तैयार था , उसकी आँखों में आंसू आ गये ! पर मैं चला आया ! थोड़ा दर्द पी लेना , दर्द के समंदर में डूब जाने से कहीं बेहतर है ! आज वैलेंटाइन डे के अवसर पे अनायास ही मन में आया लिख दिया ! शायद ये टीस कहीं सीने में उठ रही थी ! बेहतर होगा , सांसारिक होने का आभास होने पर ही प्रेम करें क्योंकि विरक्त तो सिर्फ त्याग करता है !



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