लोग कहते हैं की खुद को जानना है तो योग करो , अपने अन्दर झांक के देखो , अपने अंतर्मन में और न जाने कहा कहा , कही कोई ब्रम्हांड तक देखने की बात कर देता है , और तो और कुछ लोग ईश्वर तत्व का भी दर्शन कर लेते हैं !
मैंने किसी को नहीं देखा , न कोई अध्यात्मिकता ही महसूस की ! परन्तु रात के उस पहर में मैं खुद से रूबरू जरूर था ! कायनात की खूबसूरती एक परी के रूप में आँखों के सामने थी और मैं अपने अन्दर हो रहे एक एक परिवर्तन का साक्षी खुद बना ! अपने अन्दर की हरेक कामना , हरेक इच्छा , और पल पल बढती बेचैनी से कैसे खुद को रोक पा रहा था , ये आश्चर्य का विषय था ! रात के साढ़े तीन बजे थे ,
रेलवे के उस कम्पार्टमेंट का हरेक कोना , आज भी मेरे द्वंद्व से इत्तेफाक रखता होगा ! एक सपना , जो कुछ देर पहले मैंने देखा था , शरीर का हर एक सेल , मस्तिस्क की हर एक कोशिका , उस लक्ष्य को पाने के लिये मुझसे बगावत कर रही थी और मैं शून्य सा बैठा था ! उसकी हर एक सांस, एक निश्चित चढाव पर पहुँच कर उतर जाती, यूँ तो उस बला ने आज तक कितनी साँसे ली होंगी , अंदाजा नहीं , परन्तु आज मैं उसका शिकार था , उसके हर एक सांसो के उतार चढाव का साक्षी ! सुना था मैंने की लड़कियां अगर मुड़ कर देख लें तो लडको में कुछ हारमोंस का रिसाव हो जाता है ! तो क्या आप कल्पना कर पाने में सक्षम हैं की मेरी क्या हालत थी ! क्या मैं स्वप्न में था ? क्या मैं होश में था ? इन सब कुछ प्रश्नों को आज खुद से पूछता हूँ तो स्मृति जवाब दे जाती है !
करीब पौने चार बजे होंगे, उसके करवट लेने की आवृति बढ़ गयी थी ! मुझे भी कुछ ठण्ड महसूस हुई ! अब मैं जगा ! पहले तो , मुझे खुद पे बहुत क्रोध आया , वो बिना कम्बल के सोयी हुई थी , एक पतली चादर में लिपटी हुई और मैं जगा हुआ कम्बल में लिपता , पर पसीने से तर बतर ! क्या फायदा ? अब वो कुछ ज्यादा ही करवट बदल रही थी ! मेरे मन में ख्याल आया की कम्बल उसके ऊपर डाल दूं , पर एक पल के लिए ठिठक गया मैं. क्यों ,
एकाएक मैं कम्बल लेके उठा और उसके ऊपर डालने लगा ! उसने अपनी आँखे खोल थी ! एक मुस्कान भरी निगाहों से उसने कहा, आप क्या ओढोगे ? मैं चुप था , बस उसके ऊपर कम्बल डाल कर ठीक कर रहा था !
कहीं न कहीं मुझे लगा की वो भी जगी हुई थी , और उसका इस तरह मुस्कुरा के कुछ कहना मुझे लगा शायद उसने मेरी निगाहों की तड़प को पढ़ लिया . मैं नहीं जानता उस समय मेरी क्या स्थिति थी ? मेरे बाल बिखरे थे , मेरी आँखे शायद लाल होंगी , सुबह के चार बजने वाले थे . मैंने चुपचाप कम्बल उसके ऊपर डाला और अपने सीट पर वापस बैठने के लिया मुड़ा ! उसने मेरा हाथ पकड़ लिया ,
फिर तुरंत ही छोड़ भी दिया , और वो उठ बैठी , बोली , यहाँ जगह है , कम्बल एक है , चादर दो , आप यही लेट जाइये , क्योंकि आपको ठण्ड लगेगी . मैं चुप था , कुछ बोलने का मन नही कर रहा था , और वो शब्द बोलते समय उसके चेहरे की गंभीरता देखने लायक थी ! स्त्रियों के कितने रंग होते हैं पर सभी किसी न किसी
पर प्रेम बरसा ही देते हैं , मेरा शायद कुछ न बोलना ही ठीक , शायद बोलने में मैं लडखडा जाता और भाव प्रकट नहीं हो पाते , और मैं भाववेग में उससे लिपट जाता ! और कहता , की मुझे शांति दो , थोड़ा मेरे सर को सहला दो , या मेरे ह्रदय पर अपना हाथ रख दो , हे देवी , या कुछ और ही कहता , और कहने के साथ ही मैं टूट भी जाता , अस्तु
यंत्रवत मैं उठा , और उसके बराबर में लेट गया , एक चादर मेरे ऊपर और एक दुसरी चादर उसके ऊपर और कम्बल हम दोनों के ऊपर , शायद मर्यादा का एक आवरण मेरे ऊपर था और दूसरा आवरण उसके ऊपर और समाज क्या कहेगा , इस सबका बोझ कम्बल के रूप में हम दोनों के ऊपर !
क्रमशः .. शब्दों की पाबन्दी है ,,,


0 टिप्पणियाँ
Leave a lovely comment for the True Love Blog.