पायल का संगीत मेरे कानों में गूंजते ही मुझे अपने अतीत में बरबस ही चला जाना पड़ता है। तुम कोई बंधन नही मानती । तुम्हें समझाया जाना पसंद नही, तुम सिर्फ आ कर लिपट जाना चाहती हो मेरी बाहों में। तुम उन्हीं जिद्दी लड़कियों जैसी हो जो बचपन में अपनी जिद्द के आगे सबको झुका दिया करती थी। या उन जैसी जो अपनी पसंद की चीजों में दिन रात खोई रहती। अपने गुड्डे गुड़ियों के संसार मे। पर वास्तविक जीवन और गुड़ियों का संसार बिल्कुल अलग है। यहाँ पति भी अपनी पत्नी को बाहों में लेने के लिए सूरज छिपने का इंतेज़ार करता है। सुबह से शाम हो जाती है फिर आती है वो सांवली रात , जिसे प्रेमी युगल घड़ी घड़ी गिनकर पुकारते रहते हैं । प्रतीक्षा करते हैं उस एकांत की जो उन्हें ले जाता है सुकून के पथ पर। जैसे घुप्प अंधेरे में टिमटिमाती रोशनी । जैसे मुरझा रहे पौधों में एक लोटा पानी ।
फिर कैसे रहूं मैं सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे साथ। मेरा जॉब , मेरी पहचान ,मेरे दोस्त मेरा नाम छोड़कर। हाँ , मैं भी तुम्हे बहुत स्नेह करता हूँ , पर ये पागल नही हूँ। असामाजिक तो कतई नही । मेरा प्यार समाज के दायरे में है । मैं उन्ही लोगों में हूँ जो अभी भी रात के अंधेरे का इंतेज़ार करते है। प्रतीक्षा करता हूँ सब के सो जाने का , फिर करता हूँ तैयार खुद को। हाँ , मैं तुम्हे प्यार करने के लिए स्वयं को तैयार करता हूँ। दिन भर के सामाजिक आरोपों प्रत्यारोपों, झंझावातों से लड़ा मैं पस्त जो होता हूँ। साफ शब्दों में सुन लो मैं कर्म करता हूँ खुद के बिना और कभी थोड़ा बहुत खुद के मन से भी।
अब तू भी मान जा रे पगली। संसार को देख , क्यों नही बदल लेती खुद को ? क्यों सिर्फ मुझे ही पाना चाहती है? तू पैसे , ओहदे , रुतबे की कामना क्यों नही करती? बस रोना बंद कर। अब मैं समझाना भी बंद कर देता हूँ। आ जा मेरे हृदय से लग जा। पर हां, कल सुबह ही चली जाना। मैं एक सामाजिक पशु जो हूँ।
तुम्हारी प्रतीक्षा में.....

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