बार बार हसरत होती कि कोई दस्तक हो दरवाजे पर और तुम आ जाओ। मेरा पूरा ध्यान उसी पर था। पर तुम्हारे और मेरे बीच की दूरी मीलों की है और मन मानने को तैयार ही नही। मुझे खुद पे हंसी भी आ रही थी कि ये क्या बचपना है। पर बुखार से तपता बदन और दिल ये मानने को तैयार ही नही था । उसे तो अब भी ये आस थी कि दरवाजा खुलेगा तुम आओगी और एक मुस्कान के साथ मेरे माथे को सहलाना प्रारम्भ कर दोगी। वाह रे मेरा दिल।
करीब एक घंटे हो गए थे ।अब बुखार छूटने लगा था सभी कपड़े भीग गए थे । हड्डियों में दर्द हो रहा था । तभी मैंने अपने बिस्तर को टटोलना शुरू किया। मेरा मोबाइल यहीं कहीं था। उठाकर, मन के लाख समझाने के बाद भी मैंने उसे मैसेज किया।
" कल मिलने आ जाओ न, कुछ नही बस सर पे हाथ फेर कर चली जाना" !
घंटे भर बीतने के बाद मैं पछताने लगा। मैसेज रीड हो चुका था। पर कोई रिप्लाई नही । अब मेरी हालत जल के बिना मछली जैसी हो गयी थी। उस घड़ी को कोस रहा था जब मैंने ये मैसेज किया था। बुखार के कारण आंखों में जलन हो रही थी। एकाएक बरसात होने लगी । दोनों आंखों से बह निकले गम। थोड़ी देर में मैं शांत हो गया स्थिर, पूरी तरह।
पलके बोझिल हो गयी और मैं नींद के आगोश में चला गया।
करीब आठ बजे थे । एक कप चाय रखी हुई थी । बिल्कुल गर्म। किचन से बर्तनों के टकराने की आवाज आ रही थी। शायद कामवाली आ गयी थी। मैं उठा । चाय के कप से एक चुस्की ली। अब बुखार उतर चुका था । मोबाइल देखते ही धक्क से रात का सारा वाक्यया आंखों के सामने से गुजरने लगा। आखिर मैंने उसे मैसेज किया ही क्यों था? दिल से आवाज़ आयी कि तूने नही मैंने बहुत ही मजबूर होकर किया था। मैंने झटपट व्हाट्सएप्प खोला। शायद कोई रिप्लाई । पर वहाँ सिर्फ वही दो नीले संकेत।

0 टिप्पणियाँ
Leave a lovely comment for the True Love Blog.