श्मशान मे अघोरी वीभत्स हंस रहा था जैसे कोई अनहोनी होने वाली हो ! यत्र-तत्र स्वान रो रहे थे ! वैसे तो कुत्तों का रोना कुछ रात्री पहले से ही प्रारंभ था ! अघोरी की हंसी रह रह कर हवाओं को कंपा रही थी ! काशी के श्मशान मे भीषण दृश्य उपस्थित था ! सर्द हवाएँ ढलती उम्र वालों को रज़ाई मे भी दहला देती थी ! उसपर ये बरसात जो कड़ाके की ठंड को आमंत्रित कर रही थी ! अघोरी के मस्तक से स्वेद की बुँदे झर रही थी अपने आराध्य को इस हालत मे देख कर ! क्रोध से उसकी रह रह के समाधि लग जाती और वो खड़े खड़े किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता ! दूर से देखने पर लगता जैसे कटा हुआ कोई ठूंठ पेड़ खड़ा हो ! और जब समाधि टूटती तो वही वीभत्स अटठ्हास ! रोम रोम खड़ा कर देने वाला मंजर था !
एकाएक अघोरी कुछ ढूँढने लगा ! जगह जगह राख़ के ढेर थे ! ये वो बंदे तो जो अपने अहंकार और करोड़ो अरबों की माया छोड़कर काशी की माटी मे समा चुके थे ! माँ गंगा की लहरे कभी कभी ऊपर बढ़ आती और काशी की मिट्टी की चरण पखार कर चली जाती ! और अपने आंचल मे कुछ राख़ समेट कर ले जाती ! कहीं कहीं अधजले कपड़े पड़े थे ! अघोरी ने कितने ही कपड़ो को उठाया पर कोई भी उसे अपने आराध्य के ढंकने लायक नहीं लगा ! दो घंटे से यही उपक्रम जारी रहा ! ब्रम्हा बेला मे कुछ एक दो घंटे बाकी रहे होंगे ! एकाएक वो एक तरफ चल दिया ! पीछे पीछे पुंछ हिलाते स्वानों की सेना जो अपने अधिपति का अनुशरण कर रही थी ! दूर से एक नीम का पेड़ दिखाई दे रहा था ! यह एक घाट था ! वहाँ एक सिंदूर से पुती हनुमान की प्रतिमा थी ! जिसपर एक यज्ञोपवीत अर्पित था ! उसने वो उठा लिया ! हर्षातिरेक मे चीत्कार करते हुये वापस जा रहा था काशी कोतवाल अपने आराध्य के पास जैसे संजीवनी मिलने पर हनुमान लंका दौड़े थे ! कोई थकान नहीं, कोई विषमय नहीं बिलकुल क्रोध मिश्रित शांति छाई थी ! अंशवतार के उपवस्र को महादेव पर बड़े भारी मन से उसने अर्पित किया ! ये पुजा का वक्त नहीं परंतु कल किसने देखा ! ये काशी है धरती से परे ! आकाश से परे ! यहाँ जो भी होता है महादेव की इच्छा से होता है ! विनाश भी !
अगली सुबह करीब 10 बज रहे होंगे ! हमेशा की तरह काशी नगरी गुलजार ! एक नंगी तलवार लिए एक अघोरी का हिन्दुत्व की कार्यशाला मे प्रवेश ! बहुप्रशिक्षित द्वाररक्षक जो नीले वस्त्रों मे तैनात थे ने रोकने की कोशिष लो परंतु उन्हे अपने प्राण देने पड़े ! तलवार के एक वार ने ही देहलीविनायक का रक्तभिषेक कर दिया ! दो मस्तक जो शरीर से पूरी तरह अलग नहीं हुये थे रुधिर गंगा बहा रहे थे जैसे चित्रों मे महादेव के मस्तक से निकलती गंगा की धार दिखाई देती है ! यहाँ सफ़ेद बगुले भगवा साफा ओढ़कर सोफ़े पर बैठे मीटिंग कर रहे थे ! बगल के कमरे मे हिन्दुत्व का झंडाबरदार बैठा था जो थोड़ी देर मे इस मीटिंग का हिस्सा बनने वाला था ! पर क्या बन पाएगा ? अघोरी अंदर आया ! सिर्फ एक लंगोट , पूरे शरीर पर राख साढ़े छह फीट का अस्थिकाय शरीर ! बालों मे जटाएँ , झर रहे स्वेद से बह रही राख !
एक पल को चीख पुकार मच गयी ! उसने आते ही एक बगुले को थप्पड़ से मार कर गिरा दिया उसके कान और नाक से रक्त की धारा बहने लगी ! एक महामंडलेश्वर जो आज गंगा किनारे हिन्दुत्व के झण्डा बरदार का अभिषेक करने वाले थे घिघ्ही बंध गयी ! हाथ जोड़कर आँख मूंदकर पत्ते की तरह कापने लगे ! सनातन ने जोड़ से अट्टहास किया ! भगवाधारी हिन्दुत्व के होश जाते रहे ! प्राण बचने की आशा न रही ! गश खाकर गिर पड़े ! अघोरी का रोद्र रूप देख कर कमरे की भीड़ तितर बितर हो गयी ! कुछ दरवाजे से बाहर भाग गए कुछ की आवाज लुप्त हो गयी ! कुछ दीवाल के सहारे तड़प रहे थे उनके सीने मे काशी का दर्द उभर आया था जैसे कल रात अघोरी चीत्कार कर रहा था शमशान के बीच अपने आराध्य के उखड़े हुये शिवलिंग को लेकर !
प्रलय शेष था ! झांकी जारी थी ! कार्यालय मे आए इस तरह हड़कंप से भगवा सेवक साहब अपने मलेच्छ चपरासी के साथ कुर्सी से उठकर बाहर आने ही वाला था की अघोरी ने कमरे मे प्रवेश किया ! मलेच्छ के मुंह से मदीने वाले शिव का ही नाम सुन सका था बस होश जाते रहे ! अघोरी ने ज़ोर का अठठहास किया ये तीसरा अटठास था ! उसने आगे बढ़ कर भगवा दुपट्टा पहने हिन्दुत्व की आँख फोड़ दी ! उसने उसके आँखों को रक्त मज्जा बाहर आने तक दबाया ! उसके बाद बाल पकड़ नीचे पटक दिया ! हिन्दुत्व जिंदा था या मुर्दा ये तो नहीं पता परन्तु सनातन कुपित था ! सनातन ने हिन्दुत्व के बाल पकड़े और घसीटने लगा ! उसे लेकर बाहर आया ! जहां पहले से बगुले लाठी डंडे लेकर तैयार थे ! जैसे ही वो बाहर निकला हिन्दुत्व ने सनातन पर पहला प्रहार किया ! डंडे का प्रहार सिर पर न लगकर कंधे पर लगा पर ये क्या अधोरी ने साहब को छोडकर सामने वाले एक बगुले को पकड़ लिया ! उसके मुख मे हाथ डालकर दो फाड़ चीरने का सफल प्रयत्न कर रहा था वो ! जैसे जेसीबी मशीनों से वर्षों से दबे शिवलिंगो को उखाड़ा गया ! बगुले की चीख़ों और अघोरी के अठठास से सभी ठिठक गए ! काल भैरव की तरह दिखने वाले अघोरी ने बगुले के जबड़े को चीर दिया ! सबकी हिम्मत जवाब देने लगी ! द्वार पर पड़े द्वारपालों के शवों को रौंदता हुआ अघोरी कार्यालय से बाहर निकल आया ! साथ मे घिसट रहा था अंधा साहेब कीचड़ में लथपथ भगवा साफा और घिसट रहा था हिंदुत्व सनातन के हाथों।
अचानक से अघोरी के पैरों पर डंडे से प्रहार हुआ। एक बगुले ने हिम्मत कर के पीछे से वॉर किया। कुछ 200 मीटर तक साहेब को घसीटने के बाद अघोरी लड़खड़ा गया। काशी के भरे बाजार में ये तांडव हो रहा था । बुजुर्गों ने भी ऐसा मंजर पहले नही देखा था। अघोरी मुड़ा। टैब तक एक बगुला लोहे का रॉड लेकर आ गया । बिजली की गति से उछल कर अघोरी ने एक हाथ से उसके केश पकड़े और दूसरे हाथ की तर्जनी और मध्यमा उंगलियों से उसकी आंखें फोड़ दी। घुप्प चुप्पी और एकाएक भगदड़ हो गया औरतें चीख पड़ी लोग रो पड़े सनातन का ऐसा वीभत्स रूप देख कर । अघोरी रुका, अपनी तलवार से साहेब का गला रेतने लगा । भरे बाजार में लोग हाय हाय करने लगे ये वही लोग थे जो काशी के उखड़ते शिवलिंग को देखकर भी अंधे का स्वांग रचे रखते थे। हिंदुत्व की भीड़ में अकेला सनातनी , योगी, अघोरी हिंदुत्व को दंड दे रहा था। जैसे उसकी उसकी आत्मा को अवसर दे रहा हो कि अपना चोला बदल लें। साहेब छटपटा रहा था घर की आलमारी में करोड़ो रूपये के नए नोट रखे थे । जो कल ठेकेदार ने दिए थे। काशी में मंदिर टूट रहे थे । आंख तो फुट ही चुकी थी कोई तो छुड़ा ले अघोरी के हाथों से पर संभव नही। अयोध्या के मंदिरों को तोड़ कर कॉरिडोर बनाने का ठीका इन्हें ही मिलने वाला था दिल्ली तक पहुँच थी पर अब अंधेरा। अब अस्त। मस्तिष्क में गिरते हुए कृपालु महादेव की छवि ही साहेब की आखिरी कल्पना थी । अघोरी ने आज तीन लोगों को शिव लोक पहुंचाकर सनातन मुक्ति दी। गंगा कल बह रही थी श्मशान किलोमीटर भर दूर था। सर्दियों की गुनगुनी धूप फैली हुई थी ।
हिंदुओं की भीड़ में कोई योद्धा न बचा था जो सनातन लपलपाती ज्वाला का मुकाबला कर सके। अघोरी लंगड़ाते हुए एक हाथ मे मस्तक थामे बढ़ रहा था । पीछे पीछे लोगो का हुजूम बढ़ता जा रहा था । शमशान में एक जगह चार पांच स्वान खड़े थे । वहां लाल कपड़े में कुछ लिपटा हुआ था । अघोरी आगे बढ़ रहा था। उसकी आँखों मे संतोष था। उसका मन शांत था। वो बस जाकर अपने आराध्य को गले लगा लेना चाहता था । व्व पहुंचने ही वाला था कि उसके सिर पर उड़ती हुई ईंट आकर लगी। रक्त का फव्वारा बाह गया व्व गिर पड़ा जैसे कोई विशाल ठूंठ वृक्ष गिरता हो । अपने आराध्य से वो बस दो पग के अंतराल पर था । वह सिर्फ निर्मिमेश नजरों से उस लाल कपड़े को देख रहा था। दूर खड़ी हिन्दू भीड़ उसे पत्थर मार रही थी। हिंदूओं का निशाना ब्राम्हण(मस्तक) पर था क्योंकि ब्राम्हण को जितना ज्यादा चोट दिया जाए अघोरी उतनी जल्द मरेगा। परंतु ब्राम्हण को लक्षित कर चोट देने की प्रवित्ति होने पर भी क्षत्रिय , वैश्य और शुद्र सभी घायल हुए जा रहे थे। सनातन(अघोरी ) घिसट रहा था । उस लाल कपड़े के पास पहुंच जाए ।
दो घड़ी में वो पहुँच गया । सांप की तरह कुंडली मार कर उसने लाल कपड़े में रखी वस्तु को अपने अंक में समेट लिया। सामने साहेब का मस्तक पड़ा था। लोग पत्थरों की वर्षा कर रहे थे। एक बड़ा सा पत्थर फिर से अघोरी को मारा गया । हिंदुओं की भीड़ उत्साहित होकर प्रहार कर रही थी। पत्थर रक्त की धार बड़ी कर गया। परंतु अघोरी का धड़ वैसे ही रहा अविचल।
तभी एक पोलिस कप्तान अपने दल को साथ लेकर पहुँचा । साहेब का कटा हुआ मस्तक देखकर हृदय कांप उठा । पिछले वर्ष की घटना का स्मरण हो आया जब इसी गंगा घाट पर साहेब ने एक दंडी स्वामी पर लाठी चार्ज करने का हुक्म दिया था। साहेब का हश्र देखकर सनातन सिद्धांत की पुष्टि हो गयी। तू मरेगा , तू मरेगा ऐसे शब्द उसकी कानों में गूंजने लगे। ऐसा लगा जैसे साहेब का सिर जोर जोर से हंस रहा हो। वो पसीने में तर बतर हो गया। तभी उसे गोली की आवाज़ सुनाई दी। वो धम्म से वही बैठ गया। उसे हर जगह विनाश दिखाई दे रहा था जैसे शंभु का तीसरा नेत्र खुल रहा हो। सोंचने समझने की क्षमता जाती रही । बेहोश हो गया।
गोली अघोरी के ब्राम्हण क्षेत्र में लगी। उसके शरीर मे कोई हरकत न थी । लोगों में कोलाहल था । पुलिस धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी। एक कुत्ता गुर्रा रहा था उसे देखकर सभी कुत्ते गुर्राने लगे । कुछ पोलिस वाले कुत्तों को पत्थरों से मार कर भाग रहे थे । कुछ कुत्तियों का रुदन शुरू हो गया । वातावरण विषाद से भर उठा । सबका ध्यान उस लाल कपड़े में क्या है इस बात पर था। कल तक जो दृश्य था आज एक कपड़े के आवरण में था। पुलिश ने अघोरी के शरीर को उस लाल कपड़े और उसके अंदर ढकी वस्तु से दूर किया। दो लोग उसे घसीटते हुए वही सुला दिए जहाँ वो पत्थर खाकर पहली बार गिरा था। पुलिस ने बड़ी सावधानी से कपड़े को हटाया। हिंदुओ के मुँह खुले के खुले राह गए । अंदर कृपालु महादेव का शिवलिंग बेघर अवस्था मे था। एक सनातनी मरा पड़ा था।
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