मैं और रिज़वान साथ पढ़े । हमारी दोस्ती इतनी गहरी थी कि मेरी टॉप सीक्रेट बातें भी उसे पता थी। मेरा भी उसके घर आना जाना था। बचपन मे मैं जब भी उसके घर जाता उसके दद्दू घर के बाहर नीम के पेड़ के नीचे बैठे रहते बगल में एक तंदुरुस्त बकरा बंधा रहता परंतु हर साल बकरीद के बाद वो बकरा बदल जाता उसके जगह पे छोटा बकरा बंध जाता। आज जब मैंने उसे फ़ोन किया तो उसकी बातें अजीब सी लगीं। ऐसा लगा जैसे वो मिलना न चाहता हो। मुझे लगा कि उसके घर जो नईं भाभी आयी है उसी के कारण घर मे कलह हो रहा हो और वो दुखी हो। उसके भैया अरब रहते थे। फिर मैंने उसे surprise देने की ठान ली और मैं उसके घर चला गया।
उसके अब्बू ने दरवाजा खोला मुझे देखा तो उनका चेहरा जैसे सफेद सा हो गया । उन्होंने मुझे बैठने को कहा। पर ऐसा लग रहा था जैसे मेरा आना उन्हें बिल्कुल नागवार गुजरा हो।मुझे भी घुटन सी हो रही थी। हम दोनों आमने सामने बैठे थे। 2 मिनट बीत गया । मैंने पूछा, रिज़वान कहाँ है , उन्होंने आंखे अखबार में गड़ाए ही कह दिया, यहीं है। अब तो मुझे और भी अजीब लगने लगा। उन्होंने उसे आवाज़ दी। वो आया , निरुत्साहित सा उसने मुझसे हाथ मिलाया। मैंने पूछा, भाभी कहाँ है, वो बोला , मायके गयी है। सामने के कमरे से चूड़ियों के बजने की आवाजें आ रही थीं। किसी मर्द के खांसने की आवाज भी आई। थोड़ी देर में अंदर से एक आदमी निकला। दुबला पतला से, काला रंग, पायजामा कुर्ता और ऊपर से हाफ ऊनि स्वेटर, दांतों में पान की कत्थई, और बाल सुनहले रंग से रंगे हुए। मैंने उसे पहले कभी नही देखा था। वो कमरे से निकला , लापरवाह सा बिना हमारी ओर देखे कमरे से बाहर निकल गया। करीब पांच मिनट बाद आंटी उसी दरवाजे से निकली । मुझे देख के बोली बेटा चाय बना के लाती हूँ। आज इस घर की चुप्पी मुझे बहुत खल रही थी। सबलोग बदले बदले से, एक बार तो मुझे लगा जैसे कोई बहुत बड़ी विपदा आ गयी हो।
फिर मैंने भैया के बारे में पूछा कि वो कुशल तो हैं । उसने सहमति में सर हिलाया । फिर ऑन्टी चाय लेकर आई । हमने चाय पी। फिर मैं चला आया। मस्तिष्क सोचने पर मजबूर था, बचपन की दोस्ती में इतना ठंडापन ये अकारण ही नही । जहाँ तक रिजवान की बात है वो एक सुलझा हुआ लड़का था। अंकल भी बात विचार से कट्टर नही थे। पूरी फैमिली मुझे बहुत आधुनिक लगती थी । ऑन्टी को भी कभी मैंने बुरखे में नही देता था। उनकी दोनों बेटियां ग्रैजुएट थी जिनकी शादी हो चुकी थी। मैं जब भी जाता मुझे परिवार की तरह ही अनुभव होता। पर आज के अनुभव ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था।
अस्तु , कुछ दिन मैं घर के कामो में व्यस्त रहा । कुछ दिनों की ही छुट्टियां थीं। एक दिन बाजार में था की रिज़वान का फ़ोन आया । उसका घर नजदीक ही था । आज उसके घर का माहौल थोड़ा हल्का था । उसके अब्बू ने मुझे प्यार से बिठाया। हाल चाल पूछा सब कुछ वैसा ही जैसे पहले हुआ करता था। नाश्ता लेकर ऑन्टी आयी। हम सब लोग बैठे। कुछ इधर उधर की बातें हुईं। फिर मैं रिज़वान के कमरे में आके बैठ गया। कमरे में सिर्फ एक चौकी और एक टेबल था। चौकी पर अस्त व्यस्त सा बिस्तर और टेबल पर कुछ सामान्य ज्ञान और कंपीटिशन की पुस्तकें , कुछ प्रश्नों के सेट और एक डायरी थी। तभी रिज़वान बगल के कमरे से कुर्सी ले आया वो मोबाइल पर किसी से बात भी कर रहा था । कुर्सी रखकर वो बाहर बात करने चला गया। मैं आराम से बैठ गया। दीवारों से नज़र दौड़ाते हुए एक लंबी सांस ली। रिज़वान शायद बात करते हुए घर से बाहर निकल गया था।सामने अलमारी पर धूल जमी हुई थी। मैंने आराम से खुद को कुर्सी पर टिका दिया और दोनों पैर चौकी पर रख दिये। करीब 2 मिनट के बाद मैंने डायरी उठायी और पन्ने पलटने शुरू कर दिए। पर मुझे क्या पता था कि उन पन्नों में इस हँसते खेलते परिवार की बदनसीबी की कहानी लिखी हुई थी। एक बेटे का वो दर्द जो वो कभी किसी से नही कह सकता था । एक ऐसी कालिख जो उसके हृदय में पूत गयी थी वो अपने आप को भी मुँह नही दिखा सकता। मुझे एहसास हुआ कि वो कितनी मानसिक पीड़ा से गुजर रहा होगा।
(बीस दिन पहले)
रिज़वान के घर मे हैदर मियां(रिज़वान के अब्बू), रेहाना (रिज़वान की अम्मी) पे चीख रहे थे । आंटी का भाई जो किसी नेटवर्किंग कंपनी में था उसकी कंपनी भाग गई थी और उसने रिज़वान के घर के आस पास के कई लोगों को कंपनी में जोड़ दिया था। सभी के पैसे बाकी थे। उसके अब्बू लगातार ऑन्टी पर बरस रहे थे एक बार आंटी भी बर्दाश्त के बाहर होने के बाद अपने भाई के बचाव में उतर गयीं। दोनों तरफ से बहस होने लगी। ये बहस काफी लंबी चली । शाम को मौलवी साहब आये। उनके साथ वही मौलाना था जिसका ऊपर जिक्र हुआ है , वो भी आया था। मौलवी साहब बैठे । अंकल को कुछ अंदेशा हुआ पर फिर भी उन्होंने चाय पेश की । पर मौलवी साहब बोले, आप ये न सोंचे की आप न बताएंगे तो हमे पता नही चलेगा। आपने अपनी बीबी को तलाक दे दिया है अब आपको वही करना है । मजहबी हुक्म की तालीम करनी ही होगी। आंटी का चेहरा सफेद पड़ गया वो धम्म से कुर्सी पर आ बैठी। उनकी उम्र करीब 45 से 47 के बीच रही होगी । इस उम्र में , या अल्लाह , इतने बड़े बेटे हैं मेरे। वो चुपचाप गहरी सांसे लेने लगी। तभी रिज़वान ने घर मे प्रवेश किया जो कि सुबह हो रहे झगड़े से ऊब कर कहीं चला गया था। मौलवी ने बिना देर किए जोर जोर से सारी बात रिज़वान को बताई। उसका उद्देश्य था कि मुहल्ले के अन्य मुस्लिम परिवारों को सुना कर उन्हें भी अपने साथ कर सके। रिज़वान को काटो तो खून नही । उसने सबसे पहले मुख्य दरवाजा बंद किया । अंदर आके झांका तो देखा कि अम्मी कुर्सी पे निढाल पड़ी हैं। ना अम्मी ने उसे देखा ना उसे उनके चेहरे पर देखने की हिम्मत हुई। घर मे वो अब्बू और अम्मी सिर्फ तीन लोग ही थे।
किसी तरह मौलवी साहेब को हैदर मियां ने समझा बुझा कर मनाया। मामला 20000 रुपये और एक बकरे में तय हुआ। अच्छी बात ये थी कि रेहाना घर में सबके साथ रह सकती थी उसे । पर मौलवी साहब ने साफ कह दिया था हलाला हो के रहेगा। वो भी मौलवी के आदमी से। मौलवी की उम्र करीब 65 रही होगी। अपनी जिंदगी में उसने बीसियों हलाला किये होंगे। पर अब नही , अब ऐसे मामले में वो सक्रिय तो था पर अब वो खुद से नही बल्कि अपने आदमियों से हलाला करवाता था। कुछ दिन बाद उसने कहा कि वो सैफी से रेहाना(रिज़वान की अम्मी) का हलाला करवाएगा तो दोनों बाप बेटे शर्मशार हो उठे। सैफी रिज़वान का हमउम्र था। दोनों एक ही मुहल्ले के थे। वो रिज़वान की बहनों को देखकर लार टपकाता रहता था। इसी दरम्यान एकबार मेरे सामने दोनों की कहा सुनी हो गयी थी और उसने गंदी गाली दे दी थी रिज़वान को फिर क्या हमने उसे जबरस्त पीटा था। तब से दोनों के परिवार की आपस में नही बनती थी। पर इस बार उसने जब देखा कि मियां बीबी में झगड़ा हो रहा है तो उसने ही सबसे पहले मौलवी के सामने कसम खाकर गवाही दी की तलाक हो चुका है। मौलवी के साथ उनके घर आ धमकने वाला शख्स सैफ़ी का बाप ही था। रिज़वान ने बहुत प्रयत्न किया कि किसी तरह इस कालिख से खुद को बचा पाए पर ऐसा संभव नही था। कोई रास्ता शेष नही बचा था । उसने एक बार तो घर छोड़कर जाने के लिए भी अम्मी अब्बू को मनाना चाहा पर ये प्रैक्टिकल नही हो पाया। उनके सभी मुस्लिम पड़ोसी मौलवी के कहे अनुसार उसपे नज़र रखे हुए थे।अंततः वो हार गया। और वो दिन भी आ गया जिसमें वो काम होना था जिससे उसकी जिंदगी हमेशा के लिए कालिख से पूत जानी थी। कभी कभी वो सोचता कि काश वो हिन्दू होता , भले ही ब्राह्मण श्रेष्ठ कहते हो खुद को और दूसरों को खुद से निम्न पर हिन्दू धर्म मे जीते जी कोई उनकी माँ बहन की इज्जत पर हाथ नही डाल सकता। उनके यहां हलाला जैसा शर्मनाक रिवाज तो नही है। ये सोंच की उसकी आँखों से आंसू आ जाते । उसे मेरी भी बात याद आती , जब उसने पूछा था कि जब ब्राह्मण पे बात आती है तो सभी हिन्दू चुप हो जाते हैं,पर मौलवी के लिए सभी मुसलमान एक हो जाते हैं तब मैंने कहा था कि मुस्लिमों का मौलवी से खून का रिश्ता है पर दूसरी जातियों का ब्राह्मणों से धर्म का रिश्ता है इसलिए दोनों समाज इन चीजों को अलग तरह से लेता है।
आखिर वो रात आ ही गयी । सैफ़ी ने सुबह ही आकर कह दिया था कि वो रात को आएगा । ये कहते हुए उसने रिज़वान की तरफ देखा एक शातिर सी मुस्कान फैल गयी उसके चेहरे पे और वो जल्दी से चला गया। आज किसी ने कुछ नही खाया । सभी अपने अपने कमरों में बंद थे। घर मे चुप्पी फैली हुई थी। चुने से पुती हुई दीवारें मुर्देघर की याद दिला रही थी। रेहाना यही उधेड़बुन में थी कि वो रिज़वान और सलमान(रिज़वान का बड़ा भाई) कैसे मुँह दिखाएगी। का अल्लाह, जैसी इतनी उम्र कट गई थोड़ी और काट देता , ऐसी गारत क्यों की? दादी बनने की उम्र में ये सब सोंच के उसका मन सिहरा जा रहा था वो भी सैफ़ी के साथ , जो उसके बेटे की उम्र का है। क्या हो गया है , मौलवी को, समाज को ? सोंच सोंच के उसके मोटे मोटे आंसू बहने लगे ।हवा के झोंके से कमरे के पर्दे उड़ रहे थे।
हैदर मियाँ(रिज़वान के अब्बू) अपने कमरे में बेसुध पड़े थे। अगर इस जगहँसाई से बचने का कोई भी रास्ता होता तो आज वो आजमा लेते। खान उनके तीन पीढ़ी पहले राजपूत से कन्वर्ट हुए थे। काफी शऱीफ परिवार था इनका। बच्चे भी काफी सभ्य और शांत। हिन्दू मुसलमान सभी लोगों से इनके संबंध बड़े अच्छे थे। लोग इन्हें सुलझे हुए व्यक्तित्व का मानते थे । ये कभी भी धर्म और मज़हब के विवादों में नही पड़ते थे और कभी कभी ये भी मान लेते थे कि मज़बूरी वश उनके पूर्वजों को इस्लाम कुबुलना पड़ा। पर आज फिर मजबूरी वश एक कलंक का टीका लगने वाला था। कई दोस्तों ने हलाला के लिए खुद को प्रस्तुत किया था पर ये खून का घूंट पी कर रह गए। कल के पड़ने वाले ताने आज उनके कानों में गूंजने लगे। सोंच सोंच कर सर से पसीना आने लगा। और उन्होंने सिर कुर्सी में टिका दिया।
रात के 10 बजे चुपके से किसी ने दस्तक दी दरवाजे पर। हैदर मियां ने दरवाजा खोला। वो सैफ़ी था। दरवाजा खोलते हीं सैफ़ी सीधा रेहाना के कमरे की तरफ बढ़ने लगा । पर्दा उठाकर उसने देखा रेहाना बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी , अस्तु सैफ़ी को देखकर वो थोड़ी ठिठक गयी । सैफ़ी पर तो जैसे जुनून सवार था वो जल्दी से जाकर बिस्तर के पास खड़ा हो गया। सैफ़ी रिज़वान का हमउम्र होने के साथ कुंवारा भी था।ऊपर से रिज़वान ने उसे पीट भी दिया था कुछ दिनों पहले तो उसे बदला भी लेना था। उसने देर न करते हुए रेहाना को अपनी ओर खींचना शुरू कर दिया। घर मे उसके शौहर और बेटे दोनों थे इसलिए उसने यथासंभव प्रयास किया कि कमरे से कोई ध्वनि बाहर न जा पाए। पर होनी को ये मंज़ूर न था। हैवानियत की एक और मिशाल पेश होने वाली थी मजहब के रिवाजों के चूर्ण के रूप में। और सैफ़ी का पहला प्रहार वो सहन नही कर पाई , वो चीख पड़ी। और फ़िर लगातार...
बलात्कार में महिला पुरुष के शारीरिक सामर्थ्य के आगे बेबस होती है परंतु हलाला में पुरुष का धार्मिक सामर्थ्य महिला को बलात्कार से लाखों गुना अधिक पीड़ा देता है।
आज:
डायरी के सारे पन्ने मैं पढ़ चुका था , जिस दर्द से ये गुजरे थे उस दर्द का एहसास मुझे एक शब्द में मिला। मेरा दोस्त टूट चुका था। उस दिन जब मैं आया और सबके चेहरे की रौनक गायब थी तब मुझे ये नही पता था कि सैफ़ी का बाप भी इन्हें ब्लैकमेल कर रेहाना के साथ वो सब कर रहा था जो एक पति पत्नी करते हैं। आखिरकर फिर से सब कुछ पटरी पे आ गया था पर क्या सच मे?
मेरे हाथ मे डायरी देख कर रिज़वान घबरा कर कांपने लगा , फिर अचानक ही फफक फफक कर रोने लगा। मैंने उसे सीने से लगा लिया। पर उसका दर्द में शायद ही कम कर सकता था। शायद अब वो इस दर्द से कभी उबर नही पाए।
(ये कहानी कल्पना मात्र है इसका किसी व्यक्ति या घटना से कोई संबंध नही है। यदि ऐसी कोई समानता पाई जाती है तो उसे एक संयोग कहा जायेगा)
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3 टिप्पणियाँ
ye muslmano ki har gher ki Kahani ho gai h....
जवाब देंहटाएंAvhi vi baqt h ...unhe bapas se Hindu dherm Mae aane ka...
ye muslmano ki har gher ki Kahani ho gai h....
हटाएंAvhi vi baqt h ...unhe bapas se Hindu dherm Mae aane ka...
बलात्कार में महिला पुरुष के शारीरिक सामर्थ्य के आगे बेबस होती है परंतु हलाला में पुरुष का धार्मिक सामर्थ्य महिला को बलात्कार से लाखों गुना अधिक पीड़ा देता है।
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