चाय की तलब लग रही थी। मीठी मीठी थकावट, पसीने की बूंद के रूप में चेहरे पर और मूछों के स्थान पर आ गयी थी। कमोबेश यही हाल उसका भी था। वो मेरे बराबर में ही लेटी हुई थी। मैंने कहा- चाय पीने का मन कर रहा है क्या तुम्हारा भी?
उसे ऊँ हूँ में जवाब दिया और अपने नाखून मेरे कंधों में गड़ाने लगी। करीब 10 मिनट की प्रतीक्षा के बाद वो सुगबुगाई।
मैं चुप रहा। वो बोली। क्या सच में चाय पीने की इच्छा है । हाँ, मैं बोला।
तुम ना मेरे से प्यार ही नही करते। इतनी रात को भला चाय कौन पीता है जी । उसने  उंगली दिखाकर आंखे नचाकर ये बातें कही। मैं मुस्कुराता रहा। वो कभी भी मेरी बात नही टालती। 
लेटा हुआ मैं बस उसी के बारे में सोचता रहा। कैसे मैंने कर दिया आत्म समर्पण और कैसे उसने समेट लिया मुझे अपने अस्तित्व में। 
तभी चाय आ गयी ।
चाय का कप मेरे हाथों में देते समय उसकी मुस्कान दिखाई दी । मैं पी रहा था वो मुझे देख रही थी। सबकुछ बिल्कुल स्वाभाविक बिल्कुल प्राकृत। वो निभाती है अपना हर एक कर्तव्य । वो चाय ठंडी पीती है ताकि मुझे देख सके अपने मुस्कुराते चेहरे के साथ । मैं चाय गर्म पीता हूँ कि उसकी खूबसूरती के नशे का मुकाबला चाय की घुट के साथ कर सकूं। मैंने कप नीचे रखा। अगले ही पल हम एक दूसरे की बाहों में थे। घड़ी के कांटे रात के एक बजने का इशारा कर रहे थे।