"मेरे प्यार की उसे कोई कद्र ही नही।"
दो दिन पहले यही गुलाब जब मैंने बाजार से खरीदा था तब शर्म से पानी पानी हो उठा था मैं । दुकानदार भी मुझे अपने आंखों से स्कैन कर रहा था। मानो पूछ रहा हो किसे देना है?
तब बार बार उसका ही चेहरा नज़र आ जाता था ।
"जब ये गुलाब मैं उसे दूंगा तो उसका चेहरा इस गुलाब की तरह ही लाल हो जाएगा।"
यही सोच कर मैं खुश हुआ जा रहा था। उसके घर मे आने वाले पिज़्जा डिलीवरी बॉय को पटाना पड़ा। उसने गुलाब को अपने पिज़्जा के ऊपर इस तरह रखा जैसे ये कोई गिफ्ट हो । वो पहले तो बहुत ही आश्चर्य चकित हुई । फिर उसे यह बात थोड़ी नार्मल लगी और वो चुप हो गई। फिर वो मेरे गुलाब के साथ (अपने पिज़्ज़ा को लेकर ) घर के अंदर चली गयी। पिज़्ज़ा डिलीवरी बॉय जो कि मेरा अब राजदार बन गया था उसने चटकारे ले लेकर ये बात मुझे बताई।
शाम को मैंने उसे छत पर देखा। वो टहल रही थी । वही गुलाब उसके हाथ मे था । वो कभी उसे चूमती कभी अपने सीने से लगा लेती। मैने उसे text किया,
"पिज़्जा वाले का गुलाब इतना पसंद आ रहा है।"
वो चौक गयी। उसने रिप्लाई दिया।
तुम्हें कैसे पता"
"मुझे पता है"
"मुझे भी पता है कि ये तुमने ही भिजवाया होगा" उसने कहा
" नही"
"पिज़्ज़ा वाला तुम्हें पसंद करता है। " मैंने मज़ाक किया था।
इस बात के आज दो दिन हो गए थे ।
सूखा गुलाब मैंने पेन स्टैंड से उठाया । फिर न जाने मुझे क्या सुझा । फटाफट से दुकान जाकर चमकीले पेपर और रैपर टेप ले आया। सूखे गुलाब को एक रैपर में लपेटकर बिल्कुल गिफ्ट की तरह बना दिया। अब मैं उसे फिर से उसे भिजवाने का तरीका सोचने लगा।
फिर मेरे मन मे एक बात आई। वो कितनी निष्ठुर है जिसने गुलाब सुख जाने पर फेंक दिया । उसके लिए मैं जो शब्द लिखता हूँ उसकी भी अहमियत क्या ही होगी।
अंधेरा हो चुका था। जो पत्र मैंने उसके लिए लिखे थे सब एक एक कर पढ़ डाले। दिल भर आया। फिर मैंने उस गुलाब को रैपर से आजाद किया और उसे फिर से पेन स्टैंड में प्रतिष्ठित किया। किसी को उसकी कद्र हो या न हो मुझे तो है। इस प्रेम पत्र से किसी को लगाव हो या न हो मुझे तो है।
धन्यवाद।

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