अब अपने आकर्षण को मैं संवेदनशीलता का नाम नही देना चाहता। तुम्हारी वेदना मैंने पढ़ी और तुमने पढ़ा मेरा अकेलापन।
पर आंखों में अपने आंसू क्यों लाती हो बार बार। क्यों हर बार मेरे अंदर की तुम्हारे प्रति पनपी विरक्ति को पिघला देती हो ? क्यों दूर जाने का हौसला भी छीन लेती हो ? क्यों?
क्यों तुम्हें छूकर अब और कुछ पाने की लालसा नही रहती?
क्यों अब मुझे शांति तुम्हे देखकर ही मिलती है?
जब भी मै सोंचता हूँ अब और कोई बंधन नही तुम्हारी झुकी हुई पलके मुझे बांधने लगती हैं। और अनायास ही बंध जाता हूँ मैं तेरे चेहरे के सम्मोहन में । मन तो नदी के किनारों की परिमिति में बंध गया है और विचार बह रहें हैं लहरों की तरह।
क्या मुझे रिहा करोगी अपने इंद्रजाल से?

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