प्रिय,
माफ करना मुझे,
मुझे सिर्फ एक ही चीज समझ आती है। प्यार।
और कुछ नहीं।
तुम्हारे जितना मैं संवेदनशील नही। मैं सिर्फ प्यार की बात समझता हूँ। तुम्हारी कह गयी बातें मुझे टैब ही सुनाई देती हैं जब उसमें प्रीत का रस घुला हो। बाकि सब बातें मैं एक कान से सुनता हूँ और दूसरे कान से निकाल देता हूँ। मुझे दुनियादारी क्यों सिखाती हो ?
क्या दुनिया खुद मुझे नही सिखाती की किस तरह जीना है?
मेरी चिंता भी मत किया किया करो। क्योंकि, मैं खुद ही अपनी चिंता नही करता। मुझे मेरे खुद के नुकसान से फर्क नही पड़ता तो तुम क्यों मेरे नुकसान की चिंता करती हो । सुनो न सिर्फ प्यार करो मुझे।
मेरे अकेलापन मुझे खाये जा रहा है।
तुमसे रूठ के भी मैं उतना ही व्यथित हूँ जितना तुम्हारे खफा होने से होता हूँ। मैं सिर्फ और सिर्फ यही कहना चाहता हूँ कि मुझे प्यार करो। सिर्फ प्यार। विशुद्ध , खालिस। ताकि जब भी मैं मरूँ, मेरा मन स्थिर हो और तुम्हारी याद आये। और बस तुम्हारी ही याद आये। मेरे चेहरे पे संतुष्टि की मुस्कान हो और मन एकाग्र ही। बस मुझे प्यार करो और कुछ नही।