प्रिय 

याद करो,

जिस दिन तुम पहली बार आयी थी चेहरे पर समझदारी ओढ़कर । आत्मविश्वास से भरी मुझे गलत साबित करने । करीब 20 मिनट तुम्हे सुनता रहा। तुम्हारे चेहरे को पढ़ा। पर हाय मुझे गलत साबित करने की धुन में एक भी बार तुम्हारे चेहरे पे मुस्कान नही आई। मेरे प्रति प्यार का अंश नही दिखा। मैं चिंतित हो गया । कातर निगाहों से तुम्हें देखा । कभी तो प्यार छलक जाए पर नही तुम दृढ़ता से मुझे गलत साबित करने पर पड़ी रही।

 तुम्हारे जाने के बाद मैं तीर से बिंधे हुए हिरण की तरह छटपटाता रहा। यार करने लगा पुरानी बातें जिसमे तुम्हारे प्यार की निशानियां थी।ताकि थोडी शीतलता मिल जाये सीने में। पर तुम्हारा वह चेहरा बार बार मेरी आँखों के सामने आने लगा जिसमे मुझे गलत साबित करने की जिद थी । दो पल के लिए मैने आंखे मूंद ली थी। अब मुझे निर्णय लेना था। भविष्य देख रहा था मैं। परन्तु मैं बीते हुए लम्हों को बचा लेना चाहता था। मैं नही चाहता था की आज वर्तमान और कल भविष्य की कड़वाहट हमारे कीमती बीते हुए पलों में भी न भर जाए।

तब मैंने एक कड़वा निर्णय लिया । हाँ मैने तुमसे दूर जाना चाहा। मैं अपनी यादों और बीते लम्हों में कड़वाहट नही घुलने देना चाहता था। इसलिए मैने तुमसे कहा भी की अब मुझे जाने दो । कम से कम इतनी दूर की हम फिर कभी न मिल सके । ताकि तुम अपनी समझदारी के साथ रह सको और मैं तुम्हारी यादों के साथ। पर तुमने मेरी बात नही मानी। 


मैं जानता हूँ एक दिन आएगा जब तुम अपने चेहरे पर समझदारी की क्रीम लगा कर आओगी और कहोगी की ऐसा है हम दोनों में कुछ खास बन नही रहा। फिर बड़ी समझदारी से सारा दोष मुझपर डालोगी और इशारों इशारों में हीं जाने का संकेत दोगी। मैं जानता हूं कि तब भी मेरी नज़रें तुम्हारे चेहरे पर मेरे लिए प्यार की भावनाओं को ढूंढ रही होगी परन्तु उन्हें दिखेगी तो सिर्फ समझदारी।  


तब मैं तुम्हे छोड़कर चल दूंगा कड़वी यादों के साथ तुम जियोगी अपनी समझदारी के साथ।


जब ये सब होना ही है तो क्यों नही मुझे आज ही विदा कर देती हो अपनी जिंदगी से। क्यों मेरी यादों को कड़वी करना चाहती हो। क्यों अपनी समझदारी मुझे दिखाना चाहती हो? जबकि मैंने लाखो बार ये कहा कि मुझे तुम्हारे मासूमियत से प्यार है समझदारी से नही। शायद मैं तुम्हे नही समझना चाहता। शायद तुम मुझे समझाना चाहती हो। शायद ही मैं तुम्हें समझ पाऊँ क्यूंकि भविष्य देख लिया मैंने।