अब बस भी करो।
खुद इतनी उलझन में क्यों हो? तुम्हें तो खुश होना चाहिए। दुश्मन को कष्ट में देख खुश क्यों नही हो? कटु वाक्य लिख दिया मैंने।
ठीक है चलो सुधार देता हूँ।
अपने दोस्त को कष्ट में देखकर खुश होना चाहिए। पर दिन ब दिन वीरान क्यों होती जा रही हो?
बोलो।
चलो । मानता हूँ तुम यही कहोगी की मुझे फर्क नही पड़ता।
हाँ, तुम्हे क्यों फर्क पड़ेगा।पर मुझे तो कष्ट होता है।
जब भी मैं तुम्हारे चेहरे पे ग़म देखता हूँ। अरे पगली, देख मेरी आँखों में , जो भी खुशी या ग़म दिखे उसका एक कतरा तुमने दिया ही होगा। मैं बस यही चाहता हूँ कि तुम खुश रहो। भले ही मैं ग़मो से जार बेजार रहूँ। पर चेहरे की हंसी गायब नही होने दूंगा।
महीनों तुमने मुझे घाव दिए हैं। वर्षो तक इसके दाग रहेंगे। घाव कुरेदने से इतना दर्द नही होता मुझे जितना तुम्हारे चेहरे पर मेरे दर्द को देख कर भी खुश न होने से होता है। तुम हंसो न। इतनी हंसो , इतनी खिलखिलाओ की मेरे आगे का सफ़र आसान हो जाये।
मेरे शरीर का कतरा कतरा वेध कर भी तुम्हारे चेहरे पर खुशी नही है तो मेरी जान ले लो पर खुश हो जाओ।
अब बस भी करो और खुश रहो।


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