वह एक अच्छी प्रेमिका बन सकती थी। किसी सफाई कर्मी की, किसी चाय वाले कि या किसी पान वाले दुकानदार की।

रोज शाम को हम आफिस के बाद चाय पीने निकल जाते। आज भी कुछ अलग नही था। वही सहकर्मियों की बुराई, रोजाना कामकाज की बातें। पहले तो मन ऊब जाता था अब तो आदत हो गयी है और मन भी लगता है दूसरों की बुराई सुनने में। ऐसा प्रतीत होता है कि अब यह मानसिक संतुष्टि भी देने लगा है दिन भर की थकान के बाद।

खैर छोड़ो।

चाय की दुकान पे खड़े होकर चाय का लुफ्त ले ही रहा था कि उसपर नज़र पड़ गयी। वह कोई सफाईकर्मी प्रतीत होती थी। नीली ड्रेस पहने वह अन्य दो महिला सफाईकर्मी के साथ चाय पी रही थी। जब मैंने उसे देखा तो मुझे लगा कि वो मुझे पहले से ही देख रही है। मैं झेंप गया। फिर मैंने नज़रे फिरा ली। 

चाय खत्म करके हम अक्सर बगल की दुकान पर पान खाने चले जाते। धीरे धीरे हम उस ओर ही जा रहे थे। वो भी पान की दुकान की ओर बढ़ने लगी। उसे देख के लगता था कि उसे अपनी सुंदरता पर नाज़ है ऐसा ही गुरुर और एक मुस्कान उसके चेहरे पर थी। मैंने सरसरी निगाहों से उसे देखा। श्याम वर्ण, उम्र 27 या 28 चेहरे पर चमक थी। मुझे लगा कि वह अपने ग्रुप की मोस्ट वांटेड रही होगी। सफाई कर्मियों के समूह में वो सबसे सुंदर रही होगी। 

फिर हम लोग पान खाने लगे और वो आई और अखखड़ आवाज में पान बनाने के लिए बोली। पान वाला उसे जानता था तो उसने भी तुरंत जवाब दिया। "रुक अभी साहब के पान बनाव थाई।" मैंने देखा उसके चेहरे पे चिपकी हुई मुस्कान उसके आत्मविश्वास को बढ़ा रही थी। धीरे धीरे हम लोग वहाँ से जाने लगे। मैंने देखा उसके चेहरे पे एक बेचैनी , उसके रूप का असर हुआ कि की नही वह जानना चाहती थी। पर दुनिया की नज़र में मैं साहब था। साहब का चेहरा भाव प्रकट नही करता। दुनिया साहब को पढ़ती है कि साहब कमजोर तो नही। भावुक तो नही। और मैंने भी पीछे मुड़ के नही देखा। 

मैं भी साहब था ।