कौन कहता है कि आजकल के जोड़े प्रेम नही कर सकते। तो क्या गहराई से भरा हुआ प्यार नही करते है । वो भी करते हैं तो फिर क्या कमी है?
Bajirao mastani मूवी में तीन पात्र थे प्यार के केंद्र में। बाजीराव, मस्तानी, और काशीबाई। बाजीराव ने दोनों को बराबर प्यार करने की कोशिश की । पर उसके प्यार को सिर्फ मस्तानी ने समझा। काशीबाई ने नही । क्यों? क्योंकि काशीबाई का ego hurt हो गया था। तीनो ने मिलकर ऐसा अभिनय किया कि कहानी का दर्दनाक अंत हुआ।
चलो अब मैं अपनी बाजीराव मस्तानी की कहानी सुनाता हूँ।
इस कहानी में बाजीराव ने मस्तानी को बहुत प्यार किया सालो तक। परंतु खेल ही अलग चल रहा था। दुनिया ने मस्तानी को सिखाना शुरू किया कि बाजीराव ने तुम्हें रखैल की तरह रखा है और सिर्फ तुम्हारा use कर रहा है। धीरे धीरे बातें मस्तानी में घर कर गयी। प्यार अपने चरम पे था। वसंत चल रहा था। शीतल , मंद , सुगंध ठंडी हवा , और प्यार के दोनों पंछी । वातावरण रमणीय था।
अचानक से मस्तानी ने बाजीराव से कहा। तुम मुझसे प्यार नही करते तुम सिर्फ मेरा उपयोग करते हो। बाजीराव ने कई युद्ध लड़े थे। अनुभवी था, उसने बात हँस कर टाल दी। उस दिन पहली बार रंग में भंग पड़ गया। पर मस्तानी पर कोई असर नही। क्योंकि बाजिराओ के जवाब न देने से उसका शक़ बढ़ गया।
अगली बार फिर दोनों मिले पर मस्तानी ने कोई गर्मजोशी नही दिखाई। बाजीराव ने प्यार करना चाहा पर कुछ मज़ा नही आ रहा था। बाजिराओ ने मस्तानी को पहली बार सफाई दी। उसने चाहा की आज पूरी बातें ही खत्म कर कर दे। सारे गिले शिकवे मिटा दे ताकि कोई गांठ न रहे प्रेम में। पर कहाँ बात तो अभी शुरू हुई थी। पूरी रात्रि दोनो ने एक दूसरे को समझाने का असफल प्रयास किया। बाजीराव ने एक गहरी सांस ली। उसने पुराने दिनों को याद किया जब रातें इतनी भी लंबी नही हुआ करती थीं।
रोज रोज यही कहानी दुहराई जाने लगी। प्यार कम होने लगा जिद बढ़ने लगी। एक दिन बाजीराव ने मस्तानी का चेहरा गौर से देखा।
गाने की वो पंक्तियाँ याद आने लगी
"सागर कितना मेरे पास है , मेरे जीवन मे फिर भी प्यास है"
उसे मस्तानी के चेहरे में काशीबाई का चेहरा नज़र आया। वो सन्न रह गया। उसे समझ मे आ गया कि उसका अंत निकट है। फ़िल्म में मस्तानी और काशी दो किरदार थे असल जिंदगी में मस्तानी ही काशी बन चुकी है। उसने एक ठंडी गहरी सांस ली। उसने अपनी ओर देखा। अब वो पहले की तरह विश्वविजयी , पराक्रमी बाजीराव नही रहा। दीन हीन, आंखों में आत्मविश्वास की कमी और ग्लानि उसके चेहरे पर थी। क्या सच में उसका अंत निकट है?
सफाई देने की पूरी इच्छा ही खत्म हो गयी थी। अब उसके चेहरे पर संतोष था। घड़ी भर सोचने के बाद उसने कुछ तय किया । बाहर खूब जोर की बारिश हुई। भीतर मस्तानी हमेशा की तरह रूठी बैठी थी। वो मस्तानी की तरफ बढ़ा। उसका चेहरा अपने दोनों हथेलियों पे उठाकर गौर से देखने लगा। उसका चेहरा जर्द पीला पड़ गया था। आंखे धंस चुकी थी । उसके चेहरे पर पसरी हुई थी ज़िद। उसे देखते देखते उसका मन ऊब गया। उसने चेहरा दूसरी तरफ फिरा लिया। बाजीराव हार चुका था। एक रत्ती भी प्यार नही था मस्तानी के चेहरे पर। वो चेहरा भी पूरी तरह काशीबाई की ज़िद बयां कर रहा था।
मरता क्या न करता। बाजीराव भी एक योद्धा था उसने यही सीखा था कि मौत युद्धभूमि में ही हो और तलवार आखिरी क्षण तक हाथों में ही रहे। परंतु ये एहसास होने के बाद कि ये आखिरी युद्ध है वो जी जान से लड़ना चाहता था। शाम बीतने ही वाली थी। आखिरी रात जिसमें वो मस्तानी से मिलेगा और फिर हमेशा हमेशा के लिए बिछड़ जाएगा। दिमाग एकदम शांत था। निर्णय अटल था। विधि के विधान की तरह। हवाएँ जोरो से चल रही थी । बड़े बड़े वृक्ष उखड़ जाएंगे ऐसा प्रतीत हो रहा था। कुत्ते, श्रृंगाल कर्कश ध्वनि उत्पन्न कर रहे थे और वो चला जा रहा था मस्तानी से मिलने। क्या आखिरी बार।
आज उसने खूब स्नान किया। चंदन लगाया। इत्र लगाया। पान का वीणा मुँह में लेकर घर से निकला। उसके वस्त्र आज अद्भुत लग रहे थे जैसे चांदनी चांद से नही उसके वस्त्रों से छिटक रही हो।चेहरे पर अलग ही आभा थी । मन शून्य में विचरण कर रहा था। कोई इच्छा नही , कोई आशा नही, न कोई अपना न पराया। वह अकेला था। अकेले ही उसे ये यात्रा करनी थी। मस्तानी ने आधे रास्ते में ही छोड़ दिया। एक आदमी छोड़ दे तो क्या दूसरा सम्पूर्ण हो सकता है। हाँ या ना। यही लक्ष्य था पर अंत समय मे लक्ष्य का क्या।
उसने मस्तानी की ओर देखा। वो मुँह फेर के दूसरी ओर देख रही थी। आज उसका भी मन सुबह से बेचैन था वो कुछ कहना तो चाहती थी पर हाय वो जिद कैसे छोड़ दे। मस्तानी का चेहरा उसने हाथों में लेकर अपनी ओर घुमाया। चेहरा वही जर्द, कोई भाव नही नज़रे फिरी हुई। उसने धीरे से गालों को सहलाया फिर उसे सीने में भींच लिया। पहले तो उसने प्रतिरोध किया फिर मान गयी। बाजीराव की पकड़ बहुत मजबूत थी वो हिल भी नही पा रही थी फिर उसने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया। आज महीनों बाद दोनों गले मिले थे। हवाएँ जोरों से चल रही थी।
बाहर जोरों की बारिश होने लगी । कभी कभी तेज आवाज के साथ बिजली कड़क जाती और थोड़ी पीली रोशनी रात के अंधेरे में फैल जाती। घंटो बाद वो जगी। आज उसका मन थोड़ा हल्का हुआ। उसे ये शिकायत की तलब हुई कि महीनों बाजीराव ने उसे सीने से क्यों नही लगाया । पर अभी भी वो उसके बाहों के गिरफ्त में थी। वो हिल तो रही थी पर निकल नही पा रही थी। अब उसने अपना चेहरा बाजी के मुंह की तरफ किया। कोई संवेदना नही शायद वो सो गया था। उसके होठ थोड़े खुले थे । उसे हंसी भी आई कि इतना थक गया है कि सो गया। पता नही क्या उसके मन में आया और उसने उसे चूमना शुरू कर दिया । वो सोया है ये सोचकर बार बार उसके होंठो को चूमती चली गयी। आज बहुत दिनों के बाद उसे पुराने दिन याद आने लगे और वो यादों के आगोश में खोती चली गयी।
रात एक पहर से अधिक बीत चुकी थी। एक बिजली कड़की और पूरा कमरा पीली रोशनी से नहा गया। बाजीराव की दोनों आंखे खुली थी और पलकों में आसुओं की कुछ बूंदें। वो सन्न रह गयी। सीने को टटोला तो धड़कन गायब। सांसे नही आ रही थी। सिर्फ दोनो हाथों की हथेलियां एक दूसरे से जुड़ी हुई थी। जैसे कभी अलग नही होना चाहती हो। जिस्म बेजान हो चुका था। अचानक इतनी जोर से बिजली कड़कने की आवाज आई जैसे लगा पूरा ब्रम्हांड फट जाएगा। ऐसा ही दर्द उसे अपने सीने में महसूस हुआ। वो चला गया बिना कोई शिकायत किये। सही या गलत से परे। दूर बहुत दूर , चिर निद्रा में। उसे मस्तानी से कोई शिकायत नही ।


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