स्थान:महामना की बगिया कहा जाने वाला BHU जेठ की तपती दोपहरी में । 



सॉरी आषाढ़ की तपती दोपहरी। आजकल जेठ हो या आषाढ़ गर्मी एक समान कृपा कर रही है! खिड़की से दिखता बिरला हॉस्टल का पिछला हिस्सा जहां पके हुए जामुन के गिरने से फर्श काली हो गई है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय। महामना ने चंदा मांग मांग कर इतना बड़ा परिसर बनाया। वहीं, वो अपने ख्यालों में खोया प्रेम की भीख मांगने की योजना बना रहा था। घंटो हॉस्टल की खिड़की से वृक्षों के पत्ते निहारा करता। अब तो पक्षी भी आपस में उसे वेल्ला, नाकारा, बेकार कहते होगे! वर्तमान में तो यही स्थिति थी! 

दरअसल क्लास की एक लड़की उसे पसंद आ गई थी! बनारस आए उसे कुछ ही दिन हुए थे! पढ़ने में मेधावी वह पढ़ाई में सबकी मदद भी कर दिया करता था। फिर क्या , एक दिन वो भी आई, सांवली नही हल्की गोरी होगी वह, लंबी , लंबे लंबे बाल , पतली कमर , पतले होठ और मीठी सी अल्ट्रासोनिक आवाज। जिसका वेवलेंथ सीधे दिल को भेद देती । मुस्कुराहट भी हार्टबीट पर प्रभाव डालता। पढ़ाई का वो कांसेप्ट तो क्लियर हो गया पर एक नया अध्याय खुल गया! 


आदत नही थी चैटिंग की पर नई लत लग गई थी। रात के दो कब बज जाते पता भी नही चलता! हां, पर एक बात थी उस बंगालन में! रूठती कम थी । ऐसा लगता था की वो राजी है! एक स्थाई हां उसके चेहरे पे विराजमान रहती! कम से कम नखरे, हां वो बात बहुत जल्दी जल्दी बोलती थी जिससे बिहारी (वह) थोड़ा धीरे धीरे समझता। हालांकि उसकी बातों से ज्यादा ध्यान उसके चेहरे पे रहता, वो बस सर हिला दिया करता था! जब वो मुस्कुराती तो ऐसा लगता जैसे रोहतास के पानी भरे खेतों में हरी हरी धान की फसल लहलहा रही हो। अपनी कल्पना में तो सब कुछ कंट्रोल में था पर हकीकत में कई प्रतिद्वंदी थे। कुछ ऐसे भी थे जो उसे दिल की बात बोल देने के लिए उकसाते । रोग बाहर से दिखने में कंट्रोल में था पर अंदर ही अंदर तड़प बढ़ती जा रही थी! दिल में उठते हसरतों के तूफान किनारों को तोड़ने के लिए बेताब थे। प्यार का बुखार रोज 1 डिग्री बढ़ रहा था। 

महामना की बगिया यानी BHU के कैंपस में उसे जहां भी कपल दिखाई देते उसे अपना फ्यूचर दिखाई देता! कल इसी पेड़ के नीचे, इसी मैदान में सांझ ढले, उसी किनारे पे, उस चौराहे पे , यहां वहां वो हाथ में हाथ डाल के घूमेगा ! कभी VT विश्वनाथ मंदिर की कोल्ड कॉफी तो कभी भीड़ भाड़ वाली लंका की चाय, तो कभी अस्सी पर नौकायन और कंधे पर हाथ रख के सेल्फी। रात के दो बजे तक चैटिंग और बातचीत कर उसे ऐसा लगता जैसे अच्छे दिन अब आने ही वाले हों! पर फिर वो रात भी गुजर जाती! अरमानों के सागर में गोते लगाने से थकी हुई आंखों के साथ वो भी सो जाता पर मोबाइल बिल्कुल सीने से चिपका कर! उसके दिल की धड़कन मोबाइल के नोटिफिकेशन के वाइब्रेशन से sync हो गई थी।

वो पढ़ रहा था हरिवंश राय बच्चन की वो पंक्तियां

"धिक रे मनुष्य तुम स्वच्छ , स्वस्थ , निश्छल चुम्बन 

अंकित कर सकते नही प्रिया के अधरों पर"

पक्तियों ने उत्तेजित कर दिया। अब उसने निश्चय करने की ठान ली! घंटो पशोपेश में डूबा रहा! कल, हां कल, उस बंगालन को "आमी जे तोमार " कहना ही है। रात भर आराम से सोया इस दृढ़ निश्चय के बाद। खिड़की से आने वाली शीतल हवा उसे जैसे कह रही हो शांत गदाधारी भीम शांत! 

अस्तु

आज गर्मी कुछ कम थी! कभी धूप कभी छांव, हवा भी अच्छी बह रही थी। शाम के 5 बज रहे थे! VT पर कोल्ड कॉफी पीते हुए उसे तलब तो हुई की आज आर या पार। काजल आज उसकी सुन्दरता की धार को तेज़ कर रहा था। उसकी सफेद दंतपंक्तियां हंसते हुए चमकती तो उसे एहसास होता की सारा श्रृंगार उसी के लिए है। VT पे काफी भीड़ थी। श्रावण मास शुरू हो गया था। एक बार मन में आया की संकटमोचन चले और इस बंगालन को भी रामभक्त हनुमान का आशीर्वाद दिलवा दें। फिर दिल में आया की हनुमान जी ठहरे बाल ब्रह्मचारी , उनका आशीर्वाद मिल गया तो फिर जोड़ी बनने से रही! फिर अस्सी का विचार मन में आया। 


अस्सीघाट,

मन ही नही भरता इस जगह में बार बार आने का मन करता है। गंगा किनारे की मिट्टी पर दोनो बैठे। सामने कई नाव बंधे हुए थे। दूर नावों की बुकिंग हो रही थी! शीतल मन्द पवन हौसला बढ़ा रही थी। बोल दूं क्या? सवाल उसके सामने था जवाब बिल्कुल बगल में बैठा था। अंधेरा होने को ही था। आसमान सिंदूरी हो रहा था। उसकी बालों की लट उड़ उड़ कर उसके चेहरे को बार बार ढंक रही थी। खूबसूरती का दूसरा नाम थी वो बंगालन। बगल में बैठकर उसे स्वर्गीय सुख का अनुभव हो रहा था। गर्लफ्रेंड का सुख, जिसकी उसने कल्पना की थी सिनेमा देखकर , आज प्रत्यक्ष मिल रहा था। कुछ देर हुई। अब वो थक रहा था। क्या करे क्या न करे। असमंजस में कहीं जान न निकल जाए। 

दूर रेत पर एक चिड़ियां अपनी छोटी चोंच से जमीन कुरेद रही थी। तभी एक और चिड़िया वहा आई । दोनो के चोंच आपस में मिलने लगे। फिर दोनो फुर्र से उड़ गए। मन को शांति मिली। एक ज्ञान मिला। उसने एक लंबी सांस ली। धीरे से वो पीछे की दोनो हाथ कर के विश्राम की मुद्रा में हो गया । वो कुछ कह रही थी पर ये कहां कुछ सुन पा रहा था। बढ़े हुए हार्ट बीट के साथ उसने अपना दाहिना हाथ उसके कंधे पे रख दिया। तीनों लोक, करोड़ों ग्रहों, तारों, नक्षत्रों, पृथ्वी पर बढ़ते बोझ, जनसंख्या विस्फोट, हलाला, बेरोजगारी, आतंकवाद जैसे कई समस्याओं की अवहेलना कर बिजली की गति से उसके गालों पर एक चुम्बन कर दिया । सिंदूरी आसमान की लाली उन दोनो के चेहरे पर उतर आई। बिना प्यार का इजहार किए प्यार कर लिया गया। अस्सी घाट इसका साक्षी था और साक्षी थे दूर खड़े लोग, सिंदूरी आसमान और शीतल हवा। बहती गंगा मैया भी बंगाल की ओर ही जा रही थी। 

यह नियति है भीष्म हिमालय का पानी अंततः बंगाल में ही गिरता है। उस चुम्बन की साक्षी गंगा की धारा दूर बहुत दूर निकल चुकी थी। अंधेरा हो चुका था दोनो शांत थे। एक चुम्बन ने उनके रिश्ते को कई लेवल ऊपर अपग्रेड कर दिया था। एक बात उसकी समझ में आ गई थी। प्यार हजारों लाखों शब्दों में पिरोकर नही किया जाता। न ही रात रात भर जाग कर आंखों में डार्क सर्कल पैदा कर के। प्यार किया जाता है और प्यार सिर्फ किया जाता है। दोनो हाथों में हाथ डाल कर BHU campus की ओर बढ़ चले। एक नया इतिहास लिखने... 

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