आज़ रविवार पूरा दिन यूं ही मोबाइल में आंख गड़ाए गुजर गया। चाय की तलब लगी पर कोई साधन नहीं था। पहले यही दिनभर में मैं दसियों कप चाय पी जाया करता था अब तलब पहले से काफी कम हो गई है। उसके जाने के बाद जिंदगी नीरस ही तो होती जा रही है। एक एक दिन किसी तरह काट कर खत्म करने के बाद शाम में अजीब सी थकावट होती है। जीवन में सब कुछ बासी है कुछ भी ताज़ा नहीं। सिर्फ एक चीज ताजा है वो है तुम्हारी याद।

खैर यूं ही निकल गया, बाज़ार । सिर्फ चाय पीने। मन तो लगना न था! सर भारी था. अब मन नही लगेगा। कुछ missing सा लगता है, तब जब शाम होती है या तब जब ठंडी हवाएं बहती हैं या तब जब बारिश होती है, मेरा मन नही लगता। मन व्याकुल हो जाता है। हल्की फुहारें जब भीगाती हैं चेहरे को, आंखे बंद करने पर तुम्हारा ही चेहरा नजर आता है मुस्कुराता हुआ। एकदम ताजा। जैसे आज का खिला हुआ गुलाब हो। ओ हो ये मुझे क्या हो जाता है। Overthinking मैं चाय की चुस्की लेने लगा। 

आज की शाम अजीब तन्हा है। धूल उड़ रही है सड़को पर। आसमान भी कुछ गंदला सा है। मन जो कल तक हवा से बातें करता था। अब थक सा गया है जैसे बूढ़ा हो रहा हो कमजोर। दाढ़ी मूछें बेतरतीब बढ़ गई हैं । कल मूंछ में एक पका बाल दिखा था। जैसे बुरे दिनों के आने का संकेत दे रहा हो। तुम्हारा जाना ही ग्रीष्म है और तुम्हारा आना सावन। क्या क्या लिख रहा हूं मैं? 
मेरे शब्दों की परिधि से दूर हो तुम। क्या पढ़ोगी इन्हे ? मेरे शब्द तुम्हें पुकार रहे हैं। क्या रखोगी इनका मान? क्या आओगी मेरे पास फिर से? मुझे फिर से चाय की तलब हो रही है। 


प्रतिबंधों के किनारों पर बैठ कर तन्हेपन की गहराई मापना संभव नही और न ही इस खाई को पार कर तुमसे मिल पाना! यथास्थिति बैठे रह के तुझे याद करना ही मेरी नियति है।