फिर वही शाम ए बनारस। 

अस्सी घाट।

नाव वाले चिल्ला चिल्ला कर बैठा रहे थे । मणिकर्णिका , गंगा आरती। मैंने पूछ लिया। कितना लोगे ? 100 रुपया मांग रहा था। पर भाड़ा तो 60 रुपया है न। वह बोला, भैया शनिचर इतवार के भाड़ा बढ़ जाला। मेरा भी कुछ खास जाने का मन नही था। कौन जाए मणिकर्णिका, लाशें देखने। मैं तो अस्सी पर ही खुश हूँ। वही सुखी मिट्टी देखकर बैठ गया बिल्कुल गंगा किनारे। सर भारी था।

ठंडी हवा बह रही थी करीब आठ बजने वाला था। नावों का आवागमन कम हो गया था। अब मैं बैठ गया तो बैठ गया। गंगा किनारे छोड़ कर जाने का मन नही करता। कोई अध्यात्म नही , महादेव भी नही बस यहाँ आता हूँ तो लगता है कि वो भी साथ है। जानता हूँ कि मोह माया है सब। जो नही है उसे याद कर उसके ख्यालों में खोना मूर्खता ही है। पर बनारस आते ही घाट पर घंटों बैठे रहना मेरा व्यसन सा हो गया वो कहते हैं न अंग्रेज़ी में addiction। 


वो आज भी जेहन में चित्रित है। उसका स्पर्श, उसका मेरे कानों में फुसफुसाना , उसकी मुस्कान इतनी मादक थी कि मैं आज भी उससे बाहर नही आ पाता। सच पूछो तो मैं इसलिये गंगा किनारे आया था कि कोई इतनी सुंदर लड़की दिखे जिसके आकर्षण के वशीभूत होकर उसे अपने मस्तिष्क से निकाल पाऊं। ऐसी खूबसूरती दिखे की मस्तिष्क झनझना जाए। वो मेरी सम्पूर्ण चेतना का मर्दन कर उसमें से तुम्हारी यादों को निचोड़ कर बाहर फेंक दे। पर हाय, आज भी ये संभव न हो सका। कितनी ही लड़कियां गुजरी पर आराम न मिला। 

फिर मैं वहीँ मिट्टी पर बैठ गया। मिट्टी पे बैठने के बाद कोई बनावटीपन बाकी नही रहता। सुकून मिलता है अपने असली व्यक्तित्व के साथ। मैं नही चाहता कोई मुझे पहचाने। जब मैं तुम्हें याद करता हूँ तो चाहता हूँ कि अपनी पहचान तक खो दूं। नही है शौक मुझे साहब कहलाने का।सच कहूँ तो घंटो AC में बैठकर भी सुकून नही मिलता जो सुकून मुझे गंगा किनारे की मिट्टी पर बैठ कर मिलता है और मिलता है तुम्हारी यादों में डूबकर। घंटो पानी और नाव को निहारने के बाद ये भेद कर पाना मुश्किल हो जाता है कि तुम्हारी यादें वास्तविक हैं या काल्पनिक। 

एक बात बताऊँ। तुम्हें याद करना तुमसे प्यार करने का हिस्सा नही है। बस खुद को शांति देने का मेरा तरीका है। अपने आप को खुश करना भी जरूरी है। जब तुम्हे याद करने में ही मेरी खुशी है तो मैं क्यों न करूँ। मैं क्यों न जियूँ उन लम्हों को बार बार मेरी कल्पना में जो मुझे एक ऐसे कल्पना लोक में ले जाते हैं जहाँ से मैं तृप्त होकर वापस आता हूँ।

आवश्यक है मेरा गंगा घाट पर आना।

चुपचाप बैठना।

तुमसे बातें करना ख्यालों में।

क्यों जरूरी है ना।