ये जरूर एक हिंदू लड़का होगा। हाथ में दो राखियां। माथे पर लगे तिलक और कुछ चावल के दाने। नया कत्थई कमीज और काई रंग वाली जींस। बिलकुल शहजादा लग रहा था। गया स्टेशन पर चढ़ते ही उसने guess कर लिया था। वो बिलकुल सामने की एकल सीट पर बैठ गया। अजमेर सियालदह ट्रेन थी और कुछ इक्के दुक्के लोग ही भरे थे। 

आज रक्षाबंधन का त्योहार है।

फकरुल्ला ने अपना चेहरा खिड़की की तरफ घुमा लिया। ठंडी ठंडी हवा और धान के खेत भागते हुए अच्छे लग रहे थे। ट्रेन सरपट दौड़ रही थी ।सब तरफ हरियाली थी, सावन का जलवा था। सुबह के सात बजे थे। उसने कनखी से उसके हाथ में बंधी राखी की ओर देखा, राखियां सच में सुंदर लग रही थीं।


एक मोती वाली दूसरी ॐ वाली । उसने अपनी कलाई देखी जो बिल्कुल सूनी थी। 

बचपन की याद आ गई जब ऐसी कोई मनाही नहीं हुआ करती थी। हिंदू बच्चों की देखा देखी मां बाप भी इजाजत दे ही देते थे रक्षाबंधन मानने की। उसे याद आया तब आज की तरह नफरत नही थी। न ही हमें सुबहो शाम आगाह किया जाता था की फलां काम से इस्लाम खतरे में आ जाता है। उसकी अम्मी तो और भी सीधी साधी थी। पटना के पास के किसी गांव से अब्बा ले आए थे Love marriage। वो भी हिंदू परिवार से थी।घर में एक ही महिला थी जो उसे इस्लाम और जीवन के सबक सिखाती वो थी फुफी, राबिया। डांटती बहुत थी और उसूलों की पक्की थी। 

अम्मी गाय जैसी सीधी। कभी इधर उधर की बात करते देखा नही, बिलकुल चुप रहा करती। बाद में ये एहसास हुआ कि अब्बा और फुफी के कड़े स्वभाव के कारण उनके बोलने का कोई फायदा ही नहीं होता। सारे फैसले अब्बू और फुफी के ही होते। शायद वो अब भी घर का हिस्सा नहीं बन पाई ।  सात बहन और एक छोटा भाई । फकरुल्ला और  उसके भाई बहनों को आस पास के हिंदू परिवारों के लोग नवग्रह कह के चिढ़ाते। बचपन में तो उसे कुछ पता नही चला पर धीरे धीरे सब इल्म हो गया था। अम्मी अक्सर बीमार ही रहती थी।

राखी पहने देखना किसी को बिलकुल सामान्य सी घटना थी पर बचपन में हुए उस बात से उसे थोड़ी खीज अवश्य होने लगी थी। एकबार बचपन में वो सभी भाई बहन अम्मी से जिद करने लगी राखी बांधने की , तब सिर्फ वो पांच ही भाई बहन थे। फूफी की बेटी नादिया भी आई थी। फकरूल्ला भी नए कपड़े पहन कर तैयार होकर जिद कर रहा था की इसी बहाने मिठाई मिल जायेगी। अम्मी ने बच्चों की जिद देखकर थोड़ा प्रबंध कर दिया। बगल में ही बनिए की दुकान से काला लाल मिक्स धागा और कुछ मिठाई का प्रबंध हो गया। अम्मी  कुछ दिनों तक सिंदूर लगाती थी। एक थाली में सबको सजाया गया। खुशी का माहोल था। सब भाई बहनों ने राखी बांधी। नादिया भी मुझे राखी बांधने की जिद करने लगी। पर अम्मी सख्त हो गई। वो नही चाहती थी की ऐसा हो शायद उन्हें आने वाले खतरे का अंदेशा था। पर नादिया का बचपना और जिद ऐसी की उन्हे घुटने टेकने ही पड़े। रो रोकर उसने पूरा घर हिला दिया। वो तो ख़ैर थी की हम भाई बहन और अम्मी के अलावा घर मे कोई नही था। नही तो राखी मिठाई कुछ नही मिलता मार पड़ती वो अलग।

पांच साल पहले फूफी घर में आकर रहने लगी। उनके शौहर ने तलाक दे दिया था। छोड़ तो वो पहले ही चुके थे। नादिया और फूफी घर आ गई। घर आने पर उन्हें सबसे ज्यादा चिंता नादिया की ही रहती।  एक दिन अम्मी और फूफी में खूब कहासुनी हुई। फूफी अपनी बेटी नादिया की शादी मुझसे करना चाहती थीं और अम्मी ने फूफी को काफ़ी बुरा भला कहा। पर फखरू पर क्या बीती किसी ने नहीं पूछा न उससे इजाजत ली गई। वो करे तो क्या। उसे कुछ समझ नही आ रहा था। उसने कभी नादिया को इस नज़र से देखा ही नही था। अब्बू को कोई आपत्ति नही थी। अंत में फूफी उसे एक मौलवी के पास ले गई । मौलवी ने उसे बताया की तुम्हारी अम्मी में काफिर खून है। इस्लाम तो अपनी सगी बहन से भी निकाह करने की इजाजत देता है गर उसने एक मां का दूध नहीं पिया हो। अपनी अम्मी को ईमान के रास्ते पर ले जा। 

पहली बार उसे मौलवी की बात सुन के घिन आई। फिर मौलवी ने उसे बताया की यहूदी भी बहनों से शादी करते हैं और बहुत से उदाहरण दिए और उसे मानना ही पड़ा। या यूं कहें कि उसे मनवा दिया गया । घर में उस की चली है आजतक की आज उसकी चलती। घर का माहौल बिल्कुल अशांत हो गया। अम्मी और फूफी में बोलचाल बंद हो गई। बहनों ने कुछ प्रतिरोध दिखाया अम्मी की तरफ़ से , पर कुछ खास फायदा नही हुआ । एक दिन फूफी और अब्बू साथ आए और ऐलान किया की निकाह हो के रहेगा।

अम्मी की तबियत ये बात सुन के बिगड़ने लगी और वो गश खा कर गिर गई थी। चेहरा जर्द, काटो तो खून नहीं। फिर जगी। थोड़ा सांस लेकर फकरू को बुलाया, बोली बेटा मत कर ये शादी नहीं तो मैं जीते जी मर जाऊंगी। इस्लाम चाहे कुछ भी कहे नादिया तुम्हारी बहन है। खुदा कसम मैं इस रिश्ते से राजी नहीं। उसे याद आया क्यों अम्मी बचपन में नादिया से राखी बंधवाने को मना कर रही थीं। 

उसने नादिया को एकांत में बुलाया। नादिया अब पहले से काफी बदल चुकी थी। बेपरवाह रहने वाली नादिया हरे रंग के सलवार कमीज में एकाएक बन ठन के आई। शायद फूफी का दिया इल्म होगा। वो बगल में आकर बातें करने लगी। फखरु को समझ नही आ रहा था की वो नादिया को कैसे परखे। वो जब भी उसे देखता बहन की नजर से ही देख पाता। पर अब उसे समझ आ गया था की नादिया को इस भाई बहन के रिश्ते की कोई खास परवाह नही। सवाल पर पहले तो वो शरमाई फिर हंसते हुए उसने मंजूरी दे दी। थोड़ी बेशर्मी की झलक नादिया के चेहरे पे आई और फिर गायब हो गई। जैसे घुस लेते समय इंसान के चेहरे पर आती है फिर वो गायब हो जाती है। अब फकरू की बारी थी। शर्म , झिझक को दूर फेकना था। बहन से बेगम तक के नजरिए पर कायम होना था। 

 होनी को कौन टाल सकता है। फकरु का निकाह नादिया से हो गया। अम्मी का रहा सहा गुरुर भी ढह गया। दस बच्चे पैदा करने से वैसे भी शरीर कंकाल सा हो गया था उसपर ये मानसिक हालात। वो अक्सर बीमार रहने लगी थी।

बहन शब्द जब भी सुनता वो थोड़ा झेंप जाता था। पलकें दो चार बार शर्म से झपक जाती क्योंकि उसके सीने में  एक भाई बहन का रिश्ता दफ़न था जिसे उसने खुद अपने हाथों से गला घोंट कर मार डाला।

पूड़ी सब्जी! भेंडर आकर कान के पास चिल्लाया। फकरुल्ला की तंद्रा टूटी। वो लड़का जो सामने की सीट पर बैठा था दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन पर उतर गया। चलते हुए उसके हिलते हाथों में राखी बहुत फब रही थी। लड़के के गोरे चेहरे पे तिलक उसे प्रभावित कर रहा था। जैसे नहा धो के पवित्र हो के आया हो। उसके चेहरे पे अम्मी जैसी शांति थी जो उसे अपने फूफी के चेहरे पर कभी नही दिखी।