Amitabh Mishra poem: प्यार का ट्यूशन पढ़ाता हुं ।



तुम भूल जाती हो

मैं याद दिलाता हूं

थोडा ही सही मन से पिलाता हूं 

सूंघ कर फेंक देती हो गुलाब मेरा

मैं उस घायल नायाब को उठाता हूं।

तिरस्कार करती हो मेरे इश्क का फिर भी

मैं सब कुछ भूल जाता हुं।


तुम्हे नही पर खुद के इश्क का

सम्मान कर, मुस्कुराता हूं

फेंक कर मारती हो आरोपों को

मै झेल जाता हूं

कहां से सीखती हो बेरुखी

बेवकुफियो को तुम

तुम्हें चूमा था उस दिन

उसका कर्ज चुकाता हुं।


बिना काजल किए देखती हो तुम

आजकल ये भी सह जाता हुं

सिर्फ कहती हो तुम प्यार प्यार

और मैं निभाता हुं

क्यों नही खोज लेती मेरे जैसा कोई

यकीन दिलाता हूं 

सब प्यार के झाटू परवाने होंगे

मैं  प्यार का ट्यूशन पढ़ाता हूं।