आज फिर वो मुझे नजर आई।
मैंने पूछा:
क्या हाल है?
वो मुस्कुराई। नज़रे फेर कर फीकी मुस्कान के साथ। फिर मेरी ओर देखा आंखे नचाते हुए चिढ़ने वाले भाव के साथ बोली ,सब ठीक।
आंखे थोड़ी धंस गई थीं। चेहरा नूर खो रहा था। सब कुछ बदल रहा था। सिर्फ हमारे रिश्ते की तल्खी को छोड़कर जो की वहीं की वहीं बरकरार थी। और बरकरार थी, उनके चेहरे की समझदारी। हमने पूछ ही लिया, मुझे दूर करके क्या मिला तुम्हे?
उसने तपाक से उत्तर दिया, सुकून।
उसने थोडा संतुष्ट सा होने का भाव बनाया।
मैंने पूछा: और क्या मिला? उसने कहा: समाज में इज्जत।
मैं अनुत्तर हो गया।
मैं भी तो अलग हुआ था, सुकून तो मुझे मिला नही, और समाज में इज्जत की कोई ख्वाहिश नहीं।
थोड़ी देर मैं उसे निहारता रह गया।
अब चुम्बन प्राप्त की भी कोई आशा नहीं थी।
फिर भी मैंने आग्रह किया और उसने समझदारी से मना कर दिया।
समझदारी जीत रही थी प्रेम हार रहा था,
मैं बस खड़ा था जैसे कोई डूबते सूरज को निहार रहा हो , मेरे डूबते रिश्ते में मेरे अतीत की परछाई थी जिसे समझदारी रूपी अंधेरा ग्रस रहा था।
एकाएक सारी यादें ताज़ा होने लगी, हजारों चुम्बन, स्तंभन, आलिंगन का स्पर्श तरोताजा हो उठे जैसे सूर्यास्त के समय आकाश गंगा में हल्दी घुल जाती हो और फिर घुप अंधेरा।
वो चली गई, एक सबक देकर। और मैं रह गया उनके समझदारी भरे जवाबों के अंधेरों में घुटकर।


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