हम एक दूसरे को परख रहे थे। वो अपनी उंगली से मेरे हाथों पे न जाने क्या लिख रही थी और मैं उसके चेहरे पर लिखे रसायन के सूत्रों को निहार रहा था। एक लम्बी सी सिसकारी लेकर उसने आंखें बंद कर ली और थोडा आराम की मुद्रा में हो गई। पीछे की ओर पर उसकी उंगलियां मेरी उंगलियों पे अभी भी घर्षण कर रही थीं। मैं भी अब थक गया था। सामने एक गंजा सा व्यक्ति मुंह बाए सो रहा था। अब मैं भी रुकना चाहता था। मैंने उसके तलवों पे थोड़ी गुदगुदी की।उसने आंखे खोली। इथाइल अल्कोहल में जब फ्लेवर के लिए ओक की छाल मिलाई जाती है तो वो गुलाबी हो जाती है, वैसे ही उसकी आंखें हो गईं थी। हम दोनों के बर्थ साइड उपर में अगल बगल ही थे। खाना खाने के बहाने मैं उसके बर्थ पे आया था। पर अब जाने का मन नही कर रहा, जो होगा वो देखेंगे, सोचकर उसकी गोद सर रख कर आहिस्ता से लेट गया। उसने धीरे धीरे मेरे बालों में उंगलियां फिरानि शुरू की और मैं, एक शून्य में जा पहुंचा। ऐसा सुख मिला तो ये लगा की आज तक की मेरी सांसे व्यर्थ के कामों को करने में ही खर्च हो रही थीं। स्वर्ग यही है, मेरा है, और इसे प्राप्त करने के लिए सब खेत बेच देंगे।
अनंत विहार दिल्ली पहुंचें। वहां से उसके रूम पर गए। उसने बता रखा था की मेरा cousin भी साथ आया है। थोड़ी शर्म तो आई पर जायज़ है, प्यार में झूठ भी। थोड़ा रुके। आज प्यार की रात है, और हम रात्रिचर। रात के दो दो बजे तक हमने जो डिजिटल प्यार किया था आज analog में convert होगा ही। उसने पनीर का टुकड़ा मुझे खिलाया, पर मेरा मन तो घोड़े पर सवार था। मुझे कोई प्यार करने और खाना खाने में किसी एक को चुनने के लिए कहे तो मैं प्यार ही करूंगा ना। अब बस मन नहीं था। एकांत में मिलन का अवसर मिले तो भोजन में समय व्यर्थ क्या करना।
वो आई, मेरे सर को अपनी गोद में रख लिया। सहलाने लगी। उसकी केश राशी मेरे चेहरे को गुदगुदा रही थी। एक पल के लिए मैं बेबस सा हो गया। क्या समय यहां नहीं रुक सकता? क्या ऋषि मुनि भी हजारों वर्ष तपस्या करके इस सुख को प्राप्त कर सकेंगे? क्या होगा? धड़कने तेज़ और तेज़ होती जा रहीं थीं। उसकी आंखों में प्यार, शर्म, झिझक, प्रणय आदि कई भाव दिख रहे थे। एक चुम्बन के साथ ही मैंने विराम लगाने का असफल प्रयास किया, पर क्या रोक पाया है कोई तालिबान को पाकिस्तान में आने से? ये तो शुरूआत थी। अस्त्र शस्त्र, बादल वृष्टि, ओला पानी, इन सभी को हमने साथ में सहा फिर वही हुआ एक चिर शांति छा गई। जैसे बारिश होने पर आकाश स्वच्छ हो जाता है। जैसे भारी गोलाबारी के बाद युद्ध क्षेत्र में मुर्दानी छा जाती है। जैसे ओला गिरने के बाद फसलें ध्वस्त हो जाती हैं वैसे ही हम, घायल, शांत, बेसुध से पड़े थे। इस तूफान में हमारे दिलों की दूरियां ध्वस्त हो गईं। बरसों से बंद पड़े जंग लगे दरवाजों के परखच्चे उड़ गए। तूफ़ान के बाद आई बारिश सब कुछ बहा ले गई अगर कुछ शेष था तो वह था हमारे सीने में धधकती आग, तेज सांसे, पसीने की बूंदे और अंधेरे में सन्नाटा।
दो दिन कैसे बीते पता न चला। अब मुझे वापस आना था बनारस। पर रस तो दिल्ली में छोड़ आना था। हमने एक दूसरे से कई वादे किए। जाना तो था ही वो घड़ी भी आ गई। आख़िरी मुलाकात के वक्त उसकी आंखे भर आई। मेरी आंखें सुर्ख, पर चेहरे पे मुस्कान और सीने में तपन। मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया। पगली रोती क्यों हैं?
आंखों से होती बारिश की कसम मैं आता रहूंगा। हसरतें तूफ़ानी हो तो दिल्ली दूर नहीं। जब पुकारोगी तूफान बन के आऊंगा, भोजपुरी माटी की कसम, पूरे दिल्ली में बारिश कर के जाऊंगा। ट्रेन ने सीटी दे दी।
और हमने मन ही मन में कहा।
"अंतः अस्ति प्रारंभ " ।


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