उन्हें जिन्हें पहाड़ों से प्यार होता है, जिन्हें नदियां, चट्टान, झरने, और रेगिस्तान की रेत आकर्षित करती है, नितांत अकेले होते हैं वो लोग। जंगलों में घूमना, नदी के किनारे पर घंटों बैठना , अकेले । दुनियां को कहीं बेहतर समझते हैं वो लोग दुनियां जिन्हे बेवकूफ समझती है । ऐसे लोग ये जानकर भी की सामने वाला उन्हें धोखा दे रहा है , मुस्कुराते हुए उनका साथ देते हैं जब तक सामने वाला व्यक्ति उन्हें पूरी तरह लूट ना ले। खूब मुस्कुराते हैं, सामने वाला उन्हें तबियत से जी भरकर धोखा देकर, रंग न बदल ले तब तक। 

अपने बियावान अंधेरे, अपने अकेलेपन की चर्चा क्या करना, कई कमजोर दिल वाले लोग दुनियां छोड़ देंगे। वो लोग जो रंग बदलते हैं मेरे करीब आते हैं अपने सभी रंगों को समय के साथ दिखाते हैं, कुछ समय उनके समय उनके सान्निध्य में उनके रंगों से मेरी झोपडी रंगबिरंगी दिखती पर पर कुछ ही दिनों के बाद वो ऊबकर चले जाते है। मेरी झोपड़ी फिर से अपने प्यारे रंग में रंग जाती है। मेरा प्रिय रंग, स्याह काला। अंधेरा, अकेलापन, शांति और काला। पर एक खूबसूरती है इस रंग में जब कोई करीब आता है खूबसूरत बड़ा लगता है। जैसे एक 🪔 दिया जल गया हो एक अंधेरी कुटिया में, और मेरे सामने एक खूबसूरत सा चेहरा जिसे मैं तब तक देखता हुं जब तक सामने वाला मेरी नजरों से दूर न हो जाता मेरे अकेलेपन से घबराकर। फिर वही अंधेरा, चिर एकांत। शांति, और मेरी मन की बात जो मैं खुद से करता हुं।

बनारस। क्या करूं इस शहर का मैं? ये शहर, मुझसे हमेशा कहता है अपने और करीब आने को। हर सप्ताह बुला लेता है। कुछ समय के लिए मैं धूप देखता हुं। एक दुनियां जहां ,जहां लोग जी रहें हैं। कुछ दौड़ रहें हैं, कुछ रेंग रहे हैं। कुछ खुश है कुछ तनाव में। और एक मैं हुं जिसने जीना स्वीकार किया है। बस आज के लिए।

वो मिलने आई। उसके पतले गुलाबी होठों पर कोई तिल नहीं था । पर शायद सीने पर कहीं था, दाएं या बाएं। मैने कहा, चलो गुलाब जामुन खिलाता हुं तुम्हें। उसने हामी भरी। दिल खुश हो गया। गुलाबी होंठ और लाल गुलाब जामुन। कुछ ज्यादा ही चटक लाल थे उसके गुलाब जामुन। उसके पतले गुलाबी होठों से प्रतियोगिता कर रहे थे। वही ऊपर केशव तांबूल की प्रसिद्ध पान की दुकान है। मैने पूछा पान खाओगी। उसने पहले तो ना कहा फिर..  । फिर मैं उसके लिए पान गिलौरी लेकर आया। पान खाकर वो पहले से अधिक लजीज हो गई। उसकी आंखों में शर्म, झिझक, मस्ती, अपनापन एक एक कर आ और जा रहे थे। पान खिलाकर दोस्ती कर ली मैने। 

उसने मेरे चेहरे के बहुत करीब आकर मेरे कान में कहा, अब चलते हैं। पान की खुशबू आ रही थी। मर्यादा और पान की खुशबू, के बीच मैने खुद को उसके काफ़ी करीब पाया। मेरी जिंदगी के 30 मिनट बहुत अच्छी तरह गुजर गए। मैं देख रहा था उसके प्रकाश से मेरी कुटिया का अंधकार छट रहा था। फिर हम पैदल ही लंका गेट की तरफ चल दिए। वहीं से हमें बिछडना था। पान की खुशबू अभी मेरे जेहन में थी। वो दाएं चली गई और मैं बाएं। 


मैं आगे बढ़ा एक पान की दुकान के पास रुक गया। वो जा रही थी मैं उसे देख रहा था। पर क्या मैं उसे जाने देना चाहता था। अभी अभी तो उजाला हुआ था पर वो घड़ी घड़ी मद्धम होता जा रहा था। इस रास्ते पर मैंने बहुतों को जाते देखा... पर कभी हिम्मत ना हुई उन्हें रोक पाने की। जिसने जाने का मन बना लिया उसे कौन रोक पाया है। वो समय की तरह धीरे धीरे बीत रही थी , थोड़ी सी धुंधली दिखने लगी। पलकों को मीचकर आखिरी बार उसे जी भर के देख कर मैं मुड़ा। अपनी स्कूटी उठाई और सामने घाट वाले रास्ते से मुगलशराय की तरफ चल दिया। रामनगर के पुल की चढ़ाई मेरा अस्तित्व झेल नहीं पा रहा था। ऐसा, जैसे मैं गंगा के इस पार के लिए ही तरस रहा हूं। या तरसता रहा हूं। मैं रुका। पुल के ऊपर बीचो बीच से थोडा पहले। मैंने सिगरेट जलाई। मैं रामनगर की ओर देख रहा था। सिगरेट की पहली कश का धुआं गंगा जी ऊपर अंधेरे में विलीन हो रहा था। जैसे अंधेरा निगल रहा हो, धुएं को और मेरे अस्तित्व को। अंधेरे में पूरी तरह डूबने से पहले मैने बनारस की ओर आखिरी बार देखा। बनारस चमक रहा था। जैसे आरती के प्रकाश से भोले बाबा का भाल चमक रहा हो। मैंने हाथ जोड़े। और आज की दीवाली के लिए धन्यवाद किया। 

फिर मैं वापस चल पड़ा अपने प्रिय घुप्प अंधेरे रास्तों पर। ......